मनोज कुमार झा | लोकतंत्र संदेह के सिद्धांत पर चलने लगा है
‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित मनोज कुमार झा का लेख मुख्य रूप से इस गंभीर और विचलित करने वाले प्रश्न पर केंद्रित है कि "एक नागरिक के रूप में आखिरकार हमारी पहचान का अंतिम और पुख्ता प्रमाण क्या है?" झा ने अपने लेख में वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में नागरिकों के प्रति बढ़ते अविश्वास और लगातार दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की है.
झा के अनुसार, यह वैचारिक बहस तब और प्रासंगिक हो गई जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक के पूर्व संपादक को मतदाता सूची से नाम हटने के कारण पासपोर्ट नवीनीकरण (रिन्यूअल) से मना कर दिया गया. इसके साथ ही यह आधिकारिक तर्क सामने आया कि पासपोर्ट नागरिकता का अकाट्य प्रमाण नहीं है. वर्तमान परिदृश्य में राज्य (सरकार) द्वारा लगभग हर बड़े दस्तावेज़ की अपनी सीमाएं तय कर दी गई हैं. मसलन, आधार कार्ड केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं. मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी) नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता. और राशन कार्ड केवल कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता तक सीमित है. जन्म और निवास प्रमाण पत्रों जैसे अन्य दस्तावेजों की भी अपनी कानूनी सीमाएं तय कर दी गई हैं.
झा लिखते हैं कि कानूनी तौर पर हर बयान की व्याख्या हो सकती है, लेकिन सामूहिक रूप से यह एक बड़ा संकट पैदा करता है. भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना यह थी कि जब तक विपरीत सबूत न हो, व्यक्ति को इस देश का नागरिक माना जाएगा. यानी संदेह का बोझ राज्य पर था, नागरिक पर नहीं.
परंतु, हाल के समय में यह 'सामाजिक अनुबंध' पूरी तरह उलट गया है. अब नागरिक को लगातार खुद को निर्दोष और प्रामाणिक साबित करना पड़ता है. हर कुछ वर्षों में नई सत्यापन प्रक्रियाएं आ जाती हैं, जिससे पुराने स्थापित दस्तावेज़ भी अस्थायी और अनंतिम (प्रोविजनल) लगने लगते हैं. लोकतंत्र 'संदेह के सिद्धांत' पर चलने लगा है, जिससे आम नागरिक फाइलों, फोटोकॉपी और बायोमेट्रिक सत्यापन के अंतहीन चक्कर काटने को अभिशप्त है.
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने सदैव इस बात पर जोर दिया था कि संवैधानिक नैतिकता केवल संस्थाओं के होने से नहीं, बल्कि शासन की उन स्वस्थ आदतों और लोकतांत्रिक व्यवहार से चलती है जिससे जनता में भय के बजाय विश्वास पैदा हो.
संविधान निर्माताओं ने नागरिकता की कल्पना राज्य द्वारा समय-समय पर दिए जाने वाले किसी 'एहसान' के रूप में नहीं की थी. नागरिकता वह मूल आधार है जिससे समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मतदान जैसे सभी लोकतांत्रिक अधिकार निकलते हैं. जब राज्य अपने नागरिकों से बार-बार उनकी नागरिकता का प्रमाण मांगता है, तो वह उनके इस बुनियादी संवैधानिक अधिकार और गरिमा को चोट पहुँचाता है.
आज स्वतंत्र भारत के इतिहास में राज्य के पास अपने नागरिकों का सबसे बड़ा डेटाबेस (बायोमेट्रिक्स, टैक्स रिकॉर्ड, डिजिटल आईडी, बैंक खाते आदि) मौजूद है. विडंबना यह है कि नागरिकों को 'जानने' की इतनी अभूतपूर्व क्षमता होने के बावजूद राज्य का अविश्वास कम नहीं हुआ है.
यह स्थिति सुप्रसिद्ध लेखक फ्रांज़ काफ्का की काल्पनिक डरावनी दुनिया जैसी है, जहाँ जटिल नौकरशाही तंत्र में नियमों का कितना भी पालन कर लिया जाए, कभी अंतिम संतुष्टि या ठहराव नहीं मिलता और सत्यापन की प्रक्रिया ही अपने आप में एक अंतहीन सजा बन जाती है.
झा स्पष्ट करते हैं कि सार्वजनिक संस्थाओं की शुचिता के लिए कड़ा सत्यापन और सटीक मतदाता सूची आवश्यक है. दस्तावेज़ होने चाहिए, लेकिन उनका उद्देश्य निश्चितता लाना होना चाहिए, न कि स्थायी अनिश्चितता पैदा करना. जब दस्तावेज़ ही संशय का कारण बन जाएं, तो प्रशासनिक विश्वसनीयता समाप्त होने लगती है.
प्रशासनिक व्यवस्थाओं में एक निरंतरता होती है; आज जो कड़े नियम विरोधियों के लिए बनते हैं, वे आगे चलकर सामान्य नौकरशाही आदत बन जाते हैं जो हर राजनीतिक दल और नागरिक को प्रभावित करते हैं. दार्शनिक हैना एरेंड के शब्दों में, नागरिकता "अधिकार रखने का अधिकार" है. यदि इसकी निश्चितता खत्म हो जाए, तो बाकी सारे अधिकार ढह जाते हैं.
भारत का स्वतंत्रता संग्राम संदेह की औपनिवेशिक संस्कृति को समाप्त कर सम्मान और गरिमा की लोकतांत्रिक संस्कृति स्थापित करने के लिए लड़ा गया था. एक परिपक्व गणतंत्र को अपने नागरिकों को हमेशा संदिग्ध मानने के बजाय विश्वास पर आधारित शासन चलाना चाहिए. अंत में लेखक यह यक्ष प्रश्न छोड़ जाते हैं कि यदि पासपोर्ट, वोटर आईडी, आधार और सार्वजनिक जीवन में बिताए गए दशक भी पर्याप्त नहीं हैं, तो आखिरकार वह कौन सा अंतिम प्रमाण है जिससे यह राज्य संतुष्ट होगा?
(मनोज कुमार झा संसद सदस्य (राज्यसभा), राष्ट्रीय जनता दल हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है)

