‘मैं ज़िंदा हूँ’: भारत के मतदाता मतदाता सूची में नाम वापस दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं

‘रॉयटर्स’ के लिए सौरभ शर्मा की रिपोर्ट में कहा गया है कि कामता प्रसाद दिल्ली में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं ताकि यह साबित कर सकें कि वे जीवित हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 53 वर्षीय यह दर्जी उन 13 करोड़ लोगों में शामिल है जिनके नाम भारत की मतदाता सूची संशोधन के तहत हटा दिए गए हैं. इस प्रक्रिया ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण "तार्किक विसंगतियों" से लेकर लोगों को मृत दर्ज करने जैसे कारणों से नाम हटाए गए हैं, जिससे प्रसाद जैसे कई लोगों को केवल अपना मतदान अधिकार ही नहीं, बल्कि खुद के जीवित होने का दर्जा बहाल कराने के लिए भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है.

अपने चार सदस्यों के परिवार का भरण-पोषण करने वाले प्रसाद को इस गलती को सुधारने के लिए शहर भर में भाग-दौड़ करने हेतु अपनी 250 रुपये ($2.63) की दैनिक दिहाड़ी छोड़नी पड़ रही है.

चुनाव निकाय द्वारा 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट रोल्स (प्रारूप मतदाता सूची) के अनुसार, दिल्ली के 42 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिनमें प्रसाद भी शामिल हैं. उन्होंने कहा, "जब मैंने इस बारे में सुना तो मैं घबरा गया. तब से मैं यह साबित करने के लिए हर जगह भटक रहा हूं कि मैं जीवित हूं."

नाम हटाए जाने की इस घटना ने एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. विपक्षी दल और युवा संगठन नई दिल्ली और अन्य जगहों पर लगभग रोजाना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिन्हें पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ रहा है.

उनका आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मोदी की भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए पुनरीक्षण में हेरफेर किया है. हालांकि, चुनाव आयोग और भाजपा दोनों ने इस आरोप से इनकार किया है.

'कोई नहीं सुनता'

गैर-लाभकारी संस्था 'जन सरोकार' के स्वयंसेवक राजेंद्र कुमार के अनुसार, प्रसाद के ब्लॉक के लगभग 9,000 मतदाताओं में से करीब 2,000 मतदाताओं के नाम पुनरीक्षण के बाद हटा दिए गए, जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या अन्यत्र पंजीकृत के रूप में वर्गीकृत किया गया.

प्रसाद इस ब्लॉक में एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें मृत घोषित किया गया है, लेकिन देश भर के स्थानीय मीडिया द्वारा ऐसे कई मामले दर्ज किए गए हैं.

प्रसाद जैसे मतदाताओं के लिए सूची से बाहर होना एक नौकरशाही की उलझन जैसा बन गया है. परिस्थितियों के आधार पर उन्हें जीवित होने का प्रमाण देना, निवास स्थान साबित करना, कथित विसंगतियों को ठीक करना या नए सिरे से दस्तावेज जमा करने पड़ रहे हैं. इसके लिए चुनाव कार्यालयों के बार-बार चक्कर लगाने, चुनावी अधिकारियों के समक्ष सुनवाई और अपीलों के कई दौर शामिल हैं, जिसमें कुछ लोग अपने नाम बहाल कराने की कोशिश में हफ्तों या महीनों बिता रहे हैं.

प्रसाद ने कहा, "मैंने उनसे कहा कि मैंने पिछले विधानसभा और आम चुनावों में वोट दिया था और मैं 35 सालों से वोट दे रहा हूं, लेकिन कोई नहीं सुनता." भारत के निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में टिप्पणी के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया.

हफ्तों के विरोध प्रदर्शनों के बाद, चुनाव आयोग ने दिल्ली सहित कुछ राज्यों में नए सिरे से सत्यापन के आदेश दिए, और प्रसाद ने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उनका नाम बहाल कर दिया जाएगा.

दिल्ली में एक निजी स्कूल के 38 वर्षीय शिक्षक कमल लाल को "स्थानांतरित" के रूप में चिह्नित किया गया था, हालांकि वे अभी भी दर्जनों अन्य परिवारों के साथ एक फ्लाई-ओवर के नीचे बनी बस्ती में ही रहते हैं.

उन्होंने कहा, "यह बहुत निराशाजनक है कि हम इस देश में मतदान करते आ रहे हैं और अब हमारे नाम सिर्फ इसलिए काट दिए गए क्योंकि हमारे पास जमीन के कागज या पानी का बिल नहीं है." लाल ने बताया कि उन्हें सितंबर में अपने नाम काटे जाने के बारे में पता चला और तब से वे चुनाव अधिकारियों के पास गए हैं, सुनवाइयों में शामिल हुए हैं और नाम वापस जोड़ने के लिए कई आवेदन जमा किए हैं.

कुछ बाहर किए गए मतदाताओं के लिए अधिकारियों द्वारा दिया गया समाधान बहुत कम राहत प्रदान करने वाला रहा: उनके पिछले पंजीकरण को बहाल करने के बजाय, उन्हें नए मतदाता के रूप में नए सिरे से आवेदन करने की सलाह दी गई.

गरीब मतदाताओं के लिए डर और भी गहरा है. 39 वर्षीय ममता (जो उपनाम का उपयोग नहीं करती हैं) ने कहा, "अब स्थानीय चुनाव अधिकारी हमसे नए मतदाता के रूप में पंजीकरण करने के लिए कह रहे हैं, और मेरे पति इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने पिछले कई चुनावों में मतदान किया है."

उन्होंने आगे कहा, "मुझे डर है कि अगर हमारे नाम सूची में बहाल नहीं हुए, तो मैं सब्सिडी वाले राशन और अन्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो सकती हूं."

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