'पाकिस्तानी' से 'बांग्लादेशी' तक: भाजपा ने डर की राजनीति का नया चेहरा कैसे गढ़ा
ऑपरेशन सिंदूर की धूल अभी पूरी तरह बैठी भी नहीं है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का केंद्र अब पश्चिमी सीमा से हटकर पूर्वी सीमा की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान की जगह अब बांग्लादेश और कथित "अवैध घुसपैठ" राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाए जा रहे हैं. यह कोई आकस्मिक बदलाव नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, पिछले दो दशकों में पाकिस्तान भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति का सबसे विश्वसनीय खलनायक रहा है. चुनावी मंचों से लेकर टीवी बहसों और सोशल मीडिया तक, पाकिस्तान का नाम राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा. "घर में घुसकर मारेंगे" जैसे नारे एक आक्रामक राष्ट्रवाद की पहचान बने, जिसने भाजपा को चुनावी लाभ भी पहुंचाया.
लेकिन अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं. मई 2025 में पहलगाम हमले के बाद हुए ऑपरेशन सिंदूर के कुछ ही सप्ताहों के भीतर राजनीतिक विमर्श में एक नया मोड़ आया है. पाकिस्तान अब केंद्र में नहीं है. भाजपा की राजनीतिक और संचार मशीनरी का ध्यान अब बांग्लादेश सीमा और कथित अवैध प्रवासियों की ओर केंद्रित होता दिख रहा है.
अपेक्षित परिणाम न दे सका कूटनीतिक अभियान
पहलगाम हमले और उसके बाद की सैन्य कार्रवाई के बाद भारत सरकार ने वैश्विक स्तर पर एक व्यापक कूटनीतिक अभियान शुरू किया. विभिन्न देशों में सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजे गए ताकि भारत का पक्ष रखा जा सके और यह बताया जा सके कि हमले के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों की भूमिका थी.
इस प्रयास का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति को मजबूती देना था. लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. अधिकांश देशों ने भारत-पाकिस्तान तनाव को द्विपक्षीय विवाद के रूप में ही देखा.
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का केंद्र भारत का पक्ष नहीं, बल्कि युद्धविराम कराने में अमेरिका की भूमिका और संघर्ष में चीन की संभावित भागीदारी से जुड़े सवाल बन गए. भारत जिस आतंकवाद-विरोधी नैरेटिव को स्थापित करना चाहता था, वह वैश्विक विमर्श में प्रमुख स्थान हासिल नहीं कर सका.
दूसरी ओर पाकिस्तान ने संघर्ष के बाद की परिस्थितियों का अपेक्षाकृत बेहतर इस्तेमाल किया. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अपनी सामरिक स्थिति का लाभ उठाते हुए उसने खुद को एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की. इससे भाजपा के लिए एक राजनीतिक चुनौती पैदा हुई. राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा, जो वर्षों से उसकी राजनीति का केंद्रीय आधार रहा था, पहले जितना प्रभावी नहीं दिख रहा था.
पुरानी रणनीति, नया मोर्चा
हिंदुत्व राजनीति लंबे समय से दो तत्वों पर आधारित रही है. पहला, एक बाहरी खतरे की पहचान. दूसरा, एक आंतरिक दुश्मन की राजनीतिक रचना.
कई वर्षों तक पाकिस्तान ने बाहरी खतरे की भूमिका निभाई, जबकि भारतीय मुसलमानों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संदेह की निगाह से देखने वाला विमर्श समानांतर रूप से चलता रहा. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी हिंदुत्व राजनीति के प्रमुख प्रतीकों में से एक था, जो अब अपने राजनीतिक लक्ष्य तक पहुंच चुका है.
ऐसी स्थिति में 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा के सामने एक नया राजनीतिक एजेंडा गढ़ने की चुनौती है. पाकिस्तान को लेकर लगातार तनाव बनाए रखना भू-राजनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में बांग्लादेश और कथित अवैध प्रवास का मुद्दा एक नए राजनीतिक औजार के रूप में सामने आता है.
यह मुद्दा कई तरह की आशंकाओं को एक साथ जोड़ता है. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है, जनसंख्या संतुलन की चिंता है, आर्थिक प्रतिस्पर्धा का सवाल है और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पहचान का तत्व भी मौजूद है. यही कारण है कि यह मुद्दा राज्य चुनावों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है.
मताधिकार से वंचित करने की संरचना
इस राजनीतिक परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह संस्थागत ढांचा है जिसके माध्यम से इसे आगे बढ़ाया जा रहा है.
बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार समूहों ने गंभीर सवाल उठाए हैं. बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने को लेकर चिंताएं व्यक्त की गई हैं.
मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है. लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यदि यह प्रक्रिया विशेष समुदायों या भाषाई समूहों को असमान रूप से प्रभावित करती है, तो इसके राजनीतिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं.
इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कुछ मामलों में मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के कल्याणकारी योजनाओं पर प्रभाव पड़ने की खबरें सामने आई हैं. आलोचकों का कहना है कि मतदान के अधिकार और नागरिकता के अधिकार को एक-दूसरे से जोड़ना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि "संदिग्ध मतदाता" और "अवैध प्रवासी" जैसी अलग-अलग श्रेणियों को सार्वजनिक विमर्श में एक-दूसरे के समानार्थी के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है. इससे नागरिकता और पहचान से जुड़े प्रश्न और अधिक जटिल हो जाते हैं.
पश्चिम से सीखा गया राजनीतिक पाठ
इस पूरी राजनीति का एक वैश्विक संदर्भ भी है. पिछले एक दशक में अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में प्रवासन सबसे प्रभावशाली राजनीतिक मुद्दों में से एक बन गया है.
ब्रेक्सिट से लेकर अमेरिकी चुनावों तक, सीमाओं की सुरक्षा और प्रवासियों को लेकर बहसों ने चुनावी राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है. दक्षिणपंथी दलों ने इन मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई है.
भारतीय राजनीति में भी इसी प्रवृत्ति की झलक दिखाई देती है. राजनीतिक संदेश यह दिया जाता है कि यह किसी समुदाय विशेष के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक सुधार का प्रश्न है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि व्यवहार में इसका प्रभाव कुछ विशेष समूहों पर अधिक पड़ सकता है.
इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी का वह बयान भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश को लेकर अत्यंत आक्रामक टिप्पणी की थी. ऐसे बयान यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक भाषा किस दिशा में जा सकती है.
दांव पर क्या लगा है
भारत दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक है. यहां सैकड़ों भाषाएं, अनेक धर्म और असंख्य सामाजिक पहचानें मौजूद हैं. संविधान ने इसी विविधता को स्वीकार करते हुए समान नागरिकता और बहुलतावाद का वादा किया है.
लेकिन जब किसी समूह को लगातार संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, जब नागरिकता और पहचान के प्रश्न राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन जाएं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं.
बंगाली मुसलमान, असम के अल्पसंख्यक समुदाय और गरीब प्रवासी आबादी जैसे समूह पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में हैं. ऐसे में उनके लिए प्रशासनिक या राजनीतिक फैसलों का मुकाबला करना आसान नहीं होता.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अब तक भारत की आंतरिक राजनीति पर अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाया है. लेकिन यदि नागरिकता, अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़े सवाल लगातार गहराते हैं, तो यह केवल घरेलू राजनीति का विषय नहीं रह जाएगा.
भाजपा ने अपनी राजनीति के लिए एक नया मोर्चा खोज लिया है. अब बड़ा सवाल यह है कि भारत के भीतर और बाहर कितने लोग इस बदलाव को गंभीरता से देख रहे हैं.

