नौकरियों की मारामारी, भारत की भर्ती परीक्षाओं ने देश के ‘कॉकरोच’ युवाओं को मोदी के खिलाफ कैसे कर दिया

‘रॉयटर्स’ ने अपनी एक लंबी रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में वर्ष 1990 के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण ने देश के ढाँचे में भारी बदलाव किया. वैश्वीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार ने भारत में एक विशाल मध्यम वर्ग को जन्म दिया और देश को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार किया. इसके बावजूद, भारत की समृद्धि का प्रभाव सभी राज्यों और सामाजिक वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँचा है. बिहार जैसे पिछड़े और प्रति व्यक्ति आय में सबसे निचले पायदान पर खड़े राज्यों में आज भी आजीविका का मुख्य आधार कृषि है.

ऐसे माहौल में सरकारी नौकरियां (जैसे प्रशासनिक सेवाएं, कूटनीतिक पद, क्लर्क और फॉरेस्ट रेंजर) केवल रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, प्रतिष्ठा और गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का सबसे बड़ा साधन मानी जाती हैं. निजी क्षेत्र में कॉर्पोरेट नौकरियों की वृद्धि दर घट रही है (जो 2020 से पहले के दशक में 11% थी, वह घटकर 3% रह गई है), जिससे सरकारी नौकरियों की मांग में अत्यधिक वृद्धि हुई है. इन परीक्षाओं की प्रतिस्पर्धा इतनी कठिन हो चुकी है कि यहाँ सफलता का अनुपात वैश्विक स्तर पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने से भी कठिन माना जाता है.

2014 के बाद से भारत में बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं. आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक और सरकारी रिकॉर्ड्स के तहत कम से कम दो दर्जन परीक्षाओं को अनियमितताओं और पेपर लीक के कारण रद्द किया जा चुका है.

मई की राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र लीक होने के बाद सरकार द्वारा लगभग 20 लाख छात्रों के परीक्षा परिणामों को रद्द कर दिया गया. सालों की मेहनत, आर्थिक निवेश और उम्मीदों पर पानी फिर जाने के कारण यह निर्णय देश के इतिहास के सबसे बड़े छात्र जनाक्रोश में बदल गया. देश की युवा आबादी (30 वर्ष से कम आयु) में बेरोजगारी की दर औसतन राष्ट्रीय दर से तीन गुना अधिक है, जिससे यह गुस्सा और तीव्र हो गया.

इस छात्र असंतोष ने नई दिल्ली के ऐतिहासिक विरोध स्थल जंतर-मंतर पर एक विशाल आंदोलन का रूप लिया. इस आंदोलन की अगुवाई 'कॉकरोच जनता पार्टी' नामक एक व्यंग्यात्मक छात्र संगठन ने की. इस नाम की उत्पत्ति देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में की गई एक विवादित टिप्पणी (जिसे बाद में उन्होंने गलत अर्थ निकाले जाने की बात कहकर स्पष्ट किया था) से प्रेरित थी.

20 जुलाई को 50,000 से अधिक छात्रों और समर्थकों ने संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया. पुलिस के साथ हुई झड़पों में कई छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए, लेकिन इस घटना ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से देश भर में व्यापक सहानुभूति अर्जित की. यह आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा; इसमें विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों, विभिन्न आयु समूहों और बॉलीवुड हस्तियों ने भी खुलकर समर्थन दिया. आम तौर पर जाति, धर्म और भाषा के आधार पर बंटे समाज में यह पहला मौका था जब युवा 'शिक्षा और रोजगार' के साझा मुद्दे पर एकजुट हुए.

इस अभूतपूर्व जनाक्रोश के दबाव में आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को झुकना पड़ा और मुख्य निशाने पर रहे तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. इसके अलावा, सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून संसद में पास किया, परीक्षा प्रणाली की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया, परीक्षा रद्द होने से आहत होकर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की घोषणा की और प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने का फैसला किया.

इस संकट के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए रिपोर्ट में मुख्य रूप से दो परिवारों के संघर्ष को दर्शाया गया है:

(एक) बिहार के कुमार भाइयों का संघर्ष (अशोक और अभिषेक)

अशोक (25 वर्ष) और अभिषेक (20 वर्ष) बिहार के एक सुदूर ग्रामीण परिवार से आते हैं, जिनके माता-पिता चावल की खेती और भैंस का दूध बेचकर जीवन-यापन करते हैं. वर्ष 2014 में शुरू हुई सरकारी योजनाओं (सस्ती गैस, कृषि सब्सिडी) के कारण उनके परिवार का जीवन स्तर कुछ सुधरा था, जिससे उनके मन में मोदी सरकार के प्रति विश्वास जगा.

अशोक का संघर्ष: अशोक पिछले चार वर्षों से दिल्ली में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करने से लेकर दिल्ली की तंग गलियों के कमरे तक, उन्होंने 7 से अधिक परीक्षाएं दी हैं और लगभग 8 लाख रुपये (10,000 डॉलर) खर्च कर चुके हैं. बिहार में 2015 के खिड़की से पर्ची पहुँचाने वाले घोटालों और 2024 की पेपर लीक जैसी अनियमितताओं ने उनकी इस सोच को तोड़ दिया कि "केवल कड़ी मेहनत ही काफी होगी." अशोक के दिल्ली स्थित संकरे किराये के कमरे में, उखड़ते प्लास्टर वाली दीवारों पर पोस्टर लगे हैं, जिसमें हिंदू संत स्वामी विवेकानंद का एक प्रेरणादायक विचार भी शामिल है: "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए." 

अभिषेक की निराशा: तीन बार असफल प्रयास के बाद जब मई की मेडिकल परीक्षा रद्द हुई, तो अभिषेक का मनोबल पूरी तरह टूट गया. अपनी माँ के लिए गहने और घर के लिए टीवी खरीदने का सपना देखने वाला यह युवा अब अपने फटे जूते बदलने के लिए माता-पिता से पैसे माँगने में भी झिझक महसूस करता है.

(दो) मुंबई की सिमरन और फिल्म निर्माता दिव्या उन्नी

मुंबई में रहने वाली 21 वर्षीय सिमरन (घरेलू सहायिका ममता सिंह की बेटी) ने मेडिकल परीक्षा के लिए खुद को महीनों तक सबसे अलग-थलग करके दिन-रात तैयारी की थी. उसकी कोचिंग के लिए माँ ने अपनी मेहनत की कमाई से सालाना 2.5 लाख रुपये खर्च किए थे. परीक्षा रद्द होने के बाद सिमरन गहरे अवसाद में चली गई. पुन: परीक्षा में कम अंक आने के बाद उसने डॉक्टर बनने का सपना छोड़ दिया.

सिमरन के समर्थन में मुंबई की एक सफल फिल्म निर्माता दिव्या उन्नी ने जंतर-मंतर पहुँचकर प्रदर्शन किया. दिव्या का मानना था कि यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि देश के बच्चों के सुरक्षित भविष्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है.

रिपोर्ट का सार है कि इस आंदोलन ने मोदी सरकार की चुनावी अजेयता की छवि को चुनौती दी है. भारत की लगभग 90 करोड़ आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है. यद्यपि सरकार का तर्क है कि देश के व्यापक आर्थिक बुनियादी ढाँचे मजबूत हैं और बेरोजगारी संकट की बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर उतरे युवाओं का यह आंदोलन दर्शाता है कि परीक्षा प्रणालियों का कुप्रबंधन और युवाओं में बढ़ती कड़वाहट वर्तमान सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और नीतिगत चुनौती बन चुकी है. 

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