सुदीप ठाकुर | जेन जी के जार्गन में उलझी सरकार
वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर का विशेष विश्लेषण. एसआरसी में दिए 2013 के भाषण से लेकर जंतर-मंतर पर 2026 के 'जेन-ज़ी' आंदोलन तक—जानिए कैसे युवाओं की प्रतिरोध की भाषा और जार्गन के सामने असहज दिख रही है सत्ता.
जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों में पारंपरिक मीडिया क्यों निशाने पर है?
‘साउथ फर्स्ट’ की विशेष रिपोर्ट. जंतर-मंतर पर जेन-ज़ी छात्र आंदोलन के दौरान मुख्यधारा मीडिया और "गोदी मीडिया" के खिलाफ बढ़ता आक्रोश, पत्रकारों की चुनौतियाँ और मीडिया की साख पर गहराते सवाल.
जंतर-मंतर पर विरोध का प्रतीक बना एक स्टेंसिल: सार्वजनिक स्थान होता है स्ट्रीट आर्टिस्ट ‘टाइलर’ का कैनवास
बैरी रॉजर्स और संजना गणेश की रिपोर्ट. 'मुंबई के बैंक्सी' कहे जाने वाले स्ट्रीट आर्टिस्ट टाइलर की कला बनी जंतर-मंतर आंदोलन का प्रतीक; मोदी-अडानी-अंबानी स्टेंसिल और जेन-ज़ी के कलात्मक विरोध पर विशेष विश्लेषण.
जेन-ज़ी का विरोध प्रदर्शन 'गैर-गंभीर' नहीं, बल्कि मोदी की गढ़ी हुई छवि को चुनौती देती सविनय अवज्ञा है
‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट. जंतर-मंतर पर सुपरमैन, कॉकरोच और गांधीजी के वेश में पहुँचे युवा प्रदर्शनकारी; रील्स, कॉसप्ले और व्यंग्य के जरिए जेन-ज़ी ने गढ़ी सविनय अवज्ञा की नई भाषा.
अपर्णा वैदिक | प्रतिरोध का रोमांच और बदलाव की चुनौती
इतिहासकार अपर्णा वैदिक का विशेष विश्लेषण. सीजेपी के जंतर-मंतर आंदोलन की 1968 के फ्रांस छात्र आंदोलन, 'प्रेकारियट' वर्ग और वैश्विक जेन-ज़ी क्रांतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन.
अजीत साही | हम एक जनविद्रोह को आकार लेते हुए देख रहे हैं
वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही का विश्लेषणात्मक लेख. जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन, Gen-Z की भूमिका, आर्थिक असंतोष और भारतीय राजनीति में संभावित बड़े बदलाव पर विशेष विश्लेषण.
भारत की विपक्षी पार्टियों को ‘कॉकरोच आंदोलन’ से क्यों डरना चाहिए?
जून के पहले सप्ताहांत में दिल्ली की तपती गर्मी के बीच सैकड़ों युवाओं ने कॉकरोच के मुखौटे पहनकर एक अनोखा प्रदर्शन किया, जिसने सोशल मीडिया पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नामक आंदोलन का रूप ले लिया है. शुरुआत में एक व्यंग्य और इंटरनेट मीम दिखने वाला यह अभियान अब भारत में बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ युवाओं की गहरी निराशा का प्रतीक बन चुका है. लेख में भाजपा की लगातार चुनावी सफलताओं के समानांतर आम जनता की वास्तविक चिंताओं के दरकिनार होने, पारंपरिक राजनीतिक दलों से नागरिकों के टूटते जुड़ाव और मुख्यधारा के विपक्ष के लिए इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में विश्लेषित किया गया है.

