अरुण श्रीवास्तव | मोहन भागवत के दार्शनिक रूपकों ने मोदी की बनावटी दुनिया को हिला दिया
'काउंटरकरंट्स' में वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव ने लिखा है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया दार्शनिक बयानों ने भाजपा और आरएसएस के संबंधों, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है. 25 अगस्त को न्यूयॉर्क में भागवत ने आधुनिक राजनीति में बढ़ते स्वार्थ और "मैं, मेरा और मेरे लिए" की मानसिकता की आलोचना करते हुए कहा था कि हर उभार के बाद गिरावट आती है. इसके करीब एक महीने बाद 18 सितंबर को मध्य प्रदेश के उज्जैन में युवा धर्म संसद में उन्होंने फिर कहा, "उदय हुआ है तो अस्त भी होगा."
भागवत ने अहंकार से बचने और इस भ्रम में न रहने की बात कही कि दुनिया में सब कुछ व्यक्ति की इच्छा के अनुसार ही होता है. उन्होंने सूर्य का उदाहरण देते हुए कहा कि कोई सूर्य में विश्वास करे या न करे, वह फिर भी उगेगा और अस्त होगा. इन बयानों को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठे कि क्या यह केवल दार्शनिक टिप्पणी थी या भाजपा के मौजूदा नेतृत्व और सत्ता की कार्यशैली को लेकर कोई संदेश भी था.
आरएसएस और भाजपा के रिश्ते की पृष्ठभूमि
2009 में आरएसएस प्रमुख बनने के बाद भागवत ने संगठन में पीढ़ीगत बदलाव को आगे बढ़ाया. उस समय आरएसएस-भाजपा का राजनीतिक तंत्र लगातार चुनावी हार से उबर रहा था. भागवत ने भाजपा में पुराने नेतृत्व की पकड़ कमजोर करने और नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाने की प्रक्रिया को समर्थन दिया. इसके बाद भाजपा की राजनीति में अधिक आक्रामक और केंद्रीकृत नेतृत्व का दौर आया.
भागवत ने समय-समय पर भाजपा की राजनीतिक भाषा से अलग संकेत भी दिए. उन्होंने कहा कि मुसलमानों के बिना हिंदुत्व अधूरा है और भीड़ हिंसा की आलोचना की. उन्होंने संगठन को राजनीतिक दल की तरह पेश करने के बजाय आरएसएस को एक वैचारिक और सभ्यतागत संगठन के रूप में स्थापित करने की कोशिश की. हाल के वर्षों में उन्होंने जेन जी और सोशल मीडिया से जुड़े युवाओं तक पहुंच बढ़ाने पर भी जोर दिया.
लेख में इसके विपरीत मोदी की राजनीति को अधिक व्यक्ति-केंद्रित बताया गया है. इसी संदर्भ में भागवत के "सेवक" वाले बयान को भी महत्वपूर्ण माना गया है. उन्होंने कहा था कि सच्चा सेवक अहंकार के बिना काम करता है और उसे यह नहीं कहना चाहिए कि "मैंने यह किया". उन्होंने लोकतंत्र में विपक्ष को दुश्मन नहीं बल्कि "प्रतिपक्ष" मानने की बात भी कही थी.
2024 के बाद नेतृत्व को लेकर अटकलें
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. इसके बाद भागवत के कुछ बयानों को मोदी की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया. उन्होंने आत्म-महिमामंडन से बचने की बात कही और कहा कि व्यक्ति को स्वयं को भगवान नहीं मानना चाहिए, बल्कि लोगों को तय करने देना चाहिए कि उसमें ईश्वर है या नहीं.
भागवत के एक पुराने बयान का भी उल्लेख किया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 75 वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति को दूसरों के लिए जगह बनाने पर विचार करना चाहिए. इन टिप्पणियों को मोदी के संदर्भ में पढ़ा गया, हालांकि भागवत ने बाद में स्पष्ट किया कि आरएसएस का राजनीतिक उत्तराधिकार तय करने या मोदी को सत्ता से हटाने में कोई हस्तक्षेप नहीं है.
लेख के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में दोनों नेताओं के बीच संबंध काफी औपचारिक रहे हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर भाजपा नेतृत्व की ओर से मोदी के 2029 तक नेतृत्व जारी रखने की बात कही गई है, भागवत की ताजा टिप्पणियों ने फिर "मोदी के बाद कौन" जैसे सवालों को चर्चा में ला दिया है.
मोदी के जन्मदिन पर 'सेवा संकल्प अभियान'
भागवत का उज्जैन वाला बयान मोदी के 76वें जन्मदिन के आसपास आया. भाजपा और विभिन्न राज्य सरकारों ने 'सेवा संकल्प अभियान' के तहत महीने भर कार्यक्रम आयोजित किए. इनका उद्देश्य मोदी के सार्वजनिक जीवन और लंबे राजनीतिक सफर को रेखांकित करना था. भगवा राजनीतिक तंत्र ने इसे बड़े जनसंपर्क और संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के रूप में पेश किया.
लेकिन लेख में दावा किया गया है कि इस बार आम लोगों की स्वतःस्फूर्त भागीदारी पहले की तुलना में कम दिखाई दी. 'आशीर्वाद का दिया' अभियान में भी अपेक्षित जनभागीदारी नहीं हुई. कई राज्यों में सरकारों ने बड़े प्रकाश और दीप कार्यक्रम आयोजित किए, लेकिन आम नागरिकों की भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित रही.
बिहार में पटना के गंगा घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाने का कार्यक्रम आयोजित किया गया. सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना इसलिए भी हुई क्योंकि उसी समय राज्य के ग्रामीण इलाकों में गंभीर बाढ़ की स्थिति थी. आलोचकों ने सरकारी खर्च और जमीनी समस्याओं के बीच अंतर पर सवाल उठाए.
बाइक रैली और आर्थिक दबाव का विरोधाभास
मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी से उनके जन्मस्थान गुजरात के वडनगर तक और फिर वापस 1,366 किलोमीटर की बाइक रैली भी आयोजित की गई. लेख में इस आयोजन की तुलना प्रधानमंत्री की कुछ महीने पहले की ईंधन बचाने की अपील से की गई है. उस समय उन्होंने वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के बीच लोगों से घर से काम करने, अनावश्यक विदेश यात्रा और सोने की खरीद से बचने तथा खाना पकाने के तेल की खपत कम करने की अपील की थी.
लेख का तर्क है कि महंगे और बड़े सरकारी आयोजनों तथा आम लोगों की आर्थिक परेशानियों के बीच दिखाई देने वाला अंतर मोदी-केंद्रित प्रचार की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकता है. इसे "मोदी थकान" के संभावित संकेत के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है.
जन्मदिन समारोहों पर विवाद
आईआईएम जम्मू में छात्रों को मोदी के जन्मदिन समारोह में शामिल नहीं होने पर 500 रुपये जुर्माने की चेतावनी दिए जाने का भी उल्लेख किया गया है. इस घटना ने राजनीतिक कार्यक्रमों में संस्थानों और छात्रों की भागीदारी को लेकर सवाल खड़े किए.
17 सितंबर की शाम उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे मध्य प्रदेश सरकार ने भी बड़े पैमाने पर प्रकाश और दीप कार्यक्रम आयोजित किया. राज्य मशीनरी की व्यापक भागीदारी के साथ इसे बड़े आयोजन के रूप में पेश किया गया.
लेख में यह भी दावा किया गया है कि एक भगवा मीडिया सेल ने निजामुद्दीन मरकज में मोदी का जन्मदिन मनाए जाने की एक तस्वीर और दावा प्रसारित किया, जिसे लेख ने भ्रामक बताया.
भागवत के "उदय-अस्त", अहंकार और सत्ता की अस्थिरता वाले रूपक ऐसे समय में आए हैं जब भाजपा के भीतर नेतृत्व, संगठन और भविष्य की दिशा को लेकर चर्चा जारी है. इन बयानों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होंने मोदी के नेतृत्व, आरएसएस-भाजपा संबंधों और सत्ता के भविष्य से जुड़े सवालों को फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

