जी. रामकृष्णन | सरकारी स्कूलों के बंद होने की सबसे बड़ी कीमत गरीब बच्चे चुका रहे हैं
‘काउंटरकरंट्स’ में जी. रामकृष्णन ने लिखा है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने और विलय की बढ़ती प्रक्रिया का सबसे ज्यादा असर उन बच्चों पर पड़ रहा है, जो गरीब, ग्रामीण, दलित और आदिवासी परिवारों से आते हैं.
मध्य प्रदेश में दिसंबर में स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़ों ने शिक्षा व्यवस्था की एक गंभीर तस्वीर सामने रखी. राज्य में 7.37 लाख बच्चे ऐसे पाए गए जिनका किसी भी स्कूल में कोई रिकॉर्ड नहीं था. वे न सरकारी स्कूल में नामांकित थे और न निजी स्कूल में. इनमें बड़ी संख्या आदिवासी बहुल जिलों के बच्चों की थी.
झाबुआ और शिवपुरी में करीब 29 हजार बच्चे 'ड्रॉप बॉक्स' श्रेणी में थे, यानी वे स्कूल छोड़ने के तत्काल खतरे में थे. राज्य के 55 जिलों में 3,500 से अधिक सरकारी स्कूलों में इस शैक्षणिक सत्र में एक भी नया दाखिला नहीं हुआ, जबकि करीब 6,500 स्कूलों में दस से कम नए बच्चे आए.
राज्य में कुल 11.38 लाख बच्चे 'ड्रॉप बॉक्स' श्रेणी में हैं और 1.23 लाख पहले ही स्कूल छोड़ चुके हैं. 1.55 लाख बच्चे ऐसे हैं, जिन्होंने परिवार के विस्थापन या काम के लिए पलायन के कारण पढ़ाई छोड़ी. यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 'स्कूल चलें हम' और 'होम कॉन्टैक्ट कैंपेन' जैसे सरकारी कार्यक्रमों का उद्देश्य ही बच्चों को स्कूल से बाहर होने से रोकना था.
देशभर में घट रहे सरकारी स्कूल
मध्य प्रदेश कोई अकेला उदाहरण नहीं है. नीति आयोग के विश्लेषण के मुताबिक पिछले एक दशक में देश में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए हैं, यानी औसतन हर दिन लगभग 25 स्कूल. इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ. कुल स्कूली नामांकन में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 2005 के 71 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 49.24 प्रतिशत रह गई.
लोकसभा में पेश सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भी 2014-15 से 2023-24 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.17 लाख रह गई. इसके विपरीत निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.31 लाख हो गई.
मध्य प्रदेश में 2018-19 से अगले वर्ष सरकारी स्कूलों की संख्या करीब 1.22 लाख से घटकर 99,411 रह गई. उत्तर प्रदेश में भी इसी अवधि में सरकारी स्कूलों की संख्या 1.63 लाख से घटकर करीब 1.38 लाख हो गई.
सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों और ग्रामीण बच्चों को
सरकारी स्कूलों का इस्तेमाल समाज के सभी वर्ग समान रूप से नहीं करते. इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के गरीब परिवारों के बच्चों की संख्या अधिक है. ऐसे में स्कूल बंद होने या दूसरे स्कूल में विलय का प्रभाव भी इन परिवारों पर अधिक पड़ता है.
जम्मू-कश्मीर में युक्तिकरण की प्रक्रिया के बाद कई बच्चों को रोजाना चार से छह किलोमीटर तक यात्रा करनी पड़ रही है. वहां 4,300 से अधिक स्कूल बंद या विलय किए गए. यूडीआईएसई+ के आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में राज्य में 23,167 स्कूल थे, जो 2022-23 में घटकर 18,785 रह गए. इसी दौरान करीब 13 हजार शिक्षकों के पद खाली होने की जानकारी भी सामने आई.
इसका असर लड़कियों पर विशेष रूप से पड़ता है. जब स्कूल घर से दूर हो जाता है, तो कई गरीब परिवार सबसे पहले बेटियों की पढ़ाई रोक देते हैं.
'युक्तिकरण' के पीछे शिक्षा की गुणवत्ता
स्कूलों को समेटने या विलय करने को प्रशासनिक भाषा में 'युक्तिकरण' और दक्षता से जोड़ा जाता है, लेकिन जमीन पर इसका अर्थ कई बार एक शिक्षक द्वारा एक साथ पांच कक्षाएं संभालना होता है. इससे शिक्षक के लिए हर बच्चे की जरूरत और सीखने की स्थिति पर व्यक्तिगत ध्यान देना मुश्किल हो जाता है.
शिक्षा का अधिकार कानून 2010 से छह से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है. इसमें पड़ोस के स्कूल की व्यवस्था और शिक्षकों से जुड़े मानक भी हैं. लेकिन माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा को इस सार्वभौमिक गारंटी के दायरे में नहीं लाया गया.
लेख में सवाल उठाया गया है कि जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने के लिए राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय राशि को प्रभावित कर सकती है और भाषा नीति के जरिए राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर असर डाल सकती है, तो सरकारी स्कूलों के लगातार बंद होने पर उसकी जिम्मेदारी क्यों नहीं होनी चाहिए.
ज्योतिराव फुले ने 1882 में हंटर आयोग के सामने भी प्राथमिक शिक्षा को गरीबों तक पहुंचाने की राज्य की जिम्मेदारी पर जोर दिया था. उनका तर्क था कि गरीब किसान और मजदूर उस शिक्षा को खरीद नहीं सकते जिसे बाजार निजी व्यवस्था के हवाले कर देता है.
अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने केरल की शैक्षिक उपलब्धियों का श्रेय सार्वजनिक कार्रवाई को दिया है. शिक्षा विशेषज्ञ अनिल सदगोपाल भी मानते रहे हैं कि भारत में सार्वभौमिक और मुफ्त शिक्षा की लड़ाई अभी अधूरी है.
सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का सवाल नहीं है. यह इस बात का सवाल भी है कि समाज के सबसे गरीब बच्चों को उनके घर के पास गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी या नहीं. यदि स्कूल दूर होता गया और सार्वजनिक शिक्षा कमजोर होती गई, तो जिन परिवारों के पास निजी शिक्षा का विकल्प नहीं है, उनके बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कागज पर तो रहेगा, लेकिन व्यवहार में उसकी पहुंच लगातार सीमित होती जाएगी.
(जी. रामकृष्णन पूर्व सीपीआई-एम पोलित ब्यूरो के सदस्य सदस्य हैं.)

