मंदिर में डकैती: ये तो छोटी मछलियाँ हैं

‘द टेलीग्राफ’ में वरिष्ठ पत्रकार सुनंदा के. दत्ता-रे का यह लेख अयोध्या के राम मंदिर में हुई चढ़ावा (दान) चोरी के मामले को केंद्र में रखकर भारतीय राजनीति, प्रशासनिक विफलता, सांप्रदायिक विमर्श और सत्ता के चरित्र पर एक तीखा कटाक्ष प्रस्तुत करता है. लेखक ने मंदिर प्रबंधन में भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर विपक्षी नेताओं के बयानों, ऐतिहासिक संदर्भों और अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने का विश्लेषण किया है. प्रस्तुत है हिंदी में अनुदित लेख का सारांश:

लेख की शुरुआत राजनीतिक बदलाव और प्रशासनिक सुशासन के दावों पर सवाल उठाने के साथ होती है. लेखक का मानना है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के आधिकारिक आंकड़े यह दर्शाते हैं कि जनता ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कथित भ्रष्टाचार से तंग आकर भारतीय जनता पार्टी को चुना, लेकिन यह स्थिति 'आसमान से गिरे और खजूर पर अटके' जैसी हो गई है.

जिस 'कट मनी राज' (कमीशनखोरी) को समाप्त करने का दावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते थे, वही व्यवस्था श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में फल-फूल रही है. आधिकारिक जानकारियों के अनुसार, मंदिर के कम से कम 125 कर्मचारियों की नियुक्तियां भारी कमीशन देने के बाद ही की गई थीं.

मंदिर चोरी के बाद देश में शुरू हुई बयानबाजी पर असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रिया को लेखक ने रेखांकित किया है. इतिहास में शायद ही किसी एक संगठन (जैसे ममता बनर्जी की पार्टी) पर इतने आरोप लगे हों जितने इस घटनाक्रम में देखने को मिल रहे हैं.

लेखक अपने बचपन (11 वर्ष की आयु) की यादों को साझा करते हुए बताते हैं कि जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, तब बिहार के सिमुल्तला में रहने वाले उनके मुस्लिम ड्राइवर को यह डर सता रहा था कि इस राष्ट्रीय त्रासदी का दोष भी मुसलमानों पर ही मढ़ दिया जाएगा.

लेख में हिंदुत्व के विचारक एम.एस. गोलवलकर के उस विचार का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने गैर-हिंदुओं को हिंदू राष्ट्र के अधीन रहने और किसी भी प्रकार के विशेष अधिकार या नागरिक अधिकार का दावा न करने की बात कही थी. इसके जवाब में ओवैसी ने व्यंग्यात्मक रूप से कहा कि सरकार को इस ट्रस्ट में भी एक मुस्लिम को रख लेना चाहिए था और उसका एनकाउंटर करके या घर पर बुलडोजर चलाकर मामले को हमेशा के लिए रफा-दफा कर देना चाहिए था, क्योंकि उत्तर प्रदेश (जहाँ 19.26% मुस्लिम आबादी है) में मुसलमानों की नियति यही बना दी गई है.

ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से पूछताछ और उनके इस्तीफे के फैसले ने कई अनुत्तरित सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर सरकार मौन है. लेखक ने न्याय के सिद्धांत 'सजा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए' की विवेचना की है:

वर्ष 2004 में शांतिनिकेतन से रवींद्रनाथ टैगोर का मूल नोबेल पुरस्कार पदक (23-कैरेट सोना) चुराया गया था. लेखक का तर्क है कि वह चोरी किसी कलाप्रेमी ने नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से लालच के कारण की थी और मुमकिन है कि उसे पिघला दिया गया हो.

ऐसे अपराधों के लिए कानून के पास कोई ऐसा दंडात्मक प्रतिशोध नहीं है जो नुकसान की भरपाई कर सके. मंदिर में कैश के ढेर और सामान का गायब होना और कम वेतन पाने वाले ट्रस्ट के कर्मचारियों के पास अचानक भारी मात्रा में धन आ जाना इसी लालच का परिणाम है. ओवैसी द्वारा बताए गए 'गोली या बुलडोजर' जैसे उपाय इस प्रकार के वित्तीय और नैतिक अपराधों की सही सजा नहीं हो सकते.

इस घोटाले में शामिल वित्तीय राशि को लेकर भारी विसंगतियां और गोपनीयता बनी हुई है: शुरुआत में प्रशासन ने किसी भी प्रकार के नुकसान से इनकार किया. बाद में आधिकारिक जांच में 7 से 7.5 करोड़ रुपये के गबन की बात स्वीकार की गई. छापेमारी में केवल 79.85 लाख रुपये बरामद दिखाए गए, जबकि विपक्षी दलों का दावा है कि यह घोटाला 200 करोड़ रुपये से भी अधिक का हो सकता है. पूर्व राजस्व अधिकारी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने इसे सीधे तौर पर एक "महा डकैती" करार दिया है.

लेखक के अनुसार, जब प्रशासनिक व्यवस्थाएं विफल होती हैं, तो नेता अक्सर धार्मिक और अलौकिक तर्कों का सहारा लेते हैं. मसलन, भाजपा के स्थानीय विधायक अनिल सिंह ने एक जनसभा में दावा किया कि भगवान राम के मंदिर में चोरी करने वालों को सीधे कैंसर होगा, जो भगवान की तरफ से मौत की सजा होगी. दूसरी ओर, पूर्व नेता पवन पांडेय का मानना है कि स्वयं भगवान राम एक 'व्हिसलब्लोअर' (भेद खोलने वाले) की भूमिका निभा रहे हैं और वे ही अखिलेश यादव को चोरों को पकड़ने का रास्ता दिखा रहे हैं.

लेखक का मानना है कि इस पूरे मामले को जानबूझकर बहुत 'लो-प्रोफाइल' (शांत) रखने की कोशिश की जा रही है. हर मामले में हस्तक्षेप करने वाली सरकार इस मुद्दे पर इसलिए शांत है, क्योंकि उसे पता है कि मुस्लिम आक्रोश की तुलना में यदि बहुसंख्यक हिंदू आबादी का गुस्सा भड़का, तो परिणाम (2002 के गुजरात दंगों की तरह) अत्यंत गंभीर हो सकते हैं.

लेखक अपने बचपन के दिनों के सांप्रदायिक सौहार्द को याद करते हैं, जब समाज में बुर्के, दाढ़ी या धार्मिक कट्टरता का ऐसा प्रदर्शन नहीं था.  जब उनके बाथरूम में सांप निकला था, तो उनके मुस्लिम नौकर ने उसे सहजता से 'शिव की जटा' कहकर टाल दिया था. यानी आम जनता के स्तर पर संस्कृति मिली-जुली और सहज थी, जो राजनीति के शीर्ष पर पहुंचते ही बदल जाती है.

शीर्ष नेताओं के आचरण पर टिप्पणी करते हुए लेखक कहते हैं: राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दो साल बाद भी गृह मंत्री अमित शाह का वहां न जाना और इस पर केजरीवाल द्वारा हैरानी जताना केवल राजनीतिक चतुराई है.

राजनीतिक सीढ़ी के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए 'सत्ता' ही एकमात्र पूजनीय देवी है. प्रधानमंत्री मोदी का अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर भाग लेना और अमित शाह की दूरी यह दर्शाती है कि राजनीति में सत्ता के समीकरणों के अनुसार फैसले लिए जाते हैं, न कि शुद्ध व्यक्तिगत आस्था के आधार पर.

लेख के अंत में लेखक ने इस पूरे घटनाक्रम से निकलने वाले चार कड़वे और अपरिहार्य निष्कर्षों को रेखांकित किया है:

प्रशासनिक विफलता: सरकार चाहे अपने कुशल प्रबंधन और सुशासन के जितने भी दावे करे, यह घोटाला साबित करता है कि वह अपने स्वयं के कर्मचारियों को अनुशासित करने और उनसे ईमानदारी से काम लेने में पूरी तरह असमर्थ रही है.

फर्जी धार्मिकता और ढोंग: यदि इन पदों पर बैठे हिंदुओं की धार्मिक आस्था सच्ची होती, तो वे कभी भी भगवान के नाम पर पैसे कमाने, ट्रस्ट के साथ विश्वासघात करने और करोड़ों भक्तों की आस्था का शोषण करने की बात सपने में भी नहीं सोचते. यह दर्शाता है कि इनका धार्मिक स्वरूप केवल एक ढोंग है.

जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति: जब बात अपनी गलतियों को स्वीकार करने या जवाबदेही तय करने की आती है, तो हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के चरित्र में कोई अंतर नहीं रह जाता; दोनों ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं.

असली अपराधियों का संरक्षण (सबसे गंभीर सबक): समाज में यह अफवाह और डर व्याप्त है कि जिन आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है, वे केवल 'छोटी मछलियां' (मोहरे) हैं. इस महा-डकैती के पीछे के असली और शक्तिशाली मास्टरमाइंड पूरी तरह से आज़ाद घूम रहे हैं.

रे अंत में एक यक्ष प्रश्न छोड़कर अपनी बात समाप्त करते हैं कि बिना सरकारी पारदर्शिता के कोई नहीं जान सकता कि इस चोरी के पीछे वास्तविक दोषी कौन है. ऐसे में सवाल यही उठता है कि सरकार इस मामले पर अपनी रहस्यमयी चुप्पी कब तोड़ेगी और देश के सामने सच लेकर आएगी?

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