कुमार राणा | मतदान के अधिकार से वंचित करना लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है 

‘कड़वी कॉफी’ के इस एपिसोड में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने शोधकर्ता, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कुमार राणा के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े बदलाव पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र केवल चुनावी नतीजे नहीं थे, बल्कि वह पूरी प्रक्रिया थी जिसके जरिए बंगाल की सत्ता तृणमूल कांग्रेस से बीजेपी के हाथों में पहुंची.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद यह कहा जा रहा है कि राज्य एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है. भारतीय जनता पार्टी ने लंबे समय से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को पराजित कर बंगाल की राजनीति का नक्शा बदल दिया है. लेकिन क्या इसे केवल एक सामान्य लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन माना जा सकता है? या फिर इसके पीछे ऐसे सवाल हैं जो भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी संरचना से जुड़े हुए हैं?

कुमार राणा ने चर्चा की शुरुआत ही इस सवाल से की कि चुनाव केवल नतीजों का नाम नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया का भी नाम है जिसके जरिए नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं. उनके अनुसार लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शर्त यह है कि प्रत्येक योग्य नागरिक को मतदान का अवसर मिले. यदि बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाए, तो चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

बातचीत में पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा प्रमुखता से उठा. कुमार राणा का तर्क था कि लाखों लोगों के मतदान अधिकार प्रभावित होने के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी एक नागरिक को भी मतदान से वंचित किया जाता है, तो उसे केवल सांख्यिकीय गलती मानकर नहीं छोड़ा जा सकता. यही कारण है कि उन्होंने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बताया.

बातचीत में यह सवाल उठा कि यदि चुनावी प्रक्रिया पर व्यापक संदेह व्यक्त किए जा रहे हों, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए. कुमार राणा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की भाषा और व्यवहार से निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े हुए. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने और नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता दिखाई नहीं गई.

बंगाल की राजनीति को केवल 2011 या 2026 से समझना पर्याप्त नहीं है. इसकी जड़ें भूमि सुधार आंदोलनों, तेभागा आंदोलन, नक्सलबाड़ी और ग्रामीण सामाजिक संघर्षों तक जाती हैं. वामपंथी राजनीति ने लंबे समय तक ग्रामीण गरीबों और वंचित समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया. लेकिन समय के साथ सत्ता और समाज के बीच दूरी बढ़ती गई.

कुमार राणा का मानना है कि वाम मोर्चा शासन के अंतिम वर्षों में शिक्षित मध्यवर्ग और शहरी अभिजात वर्ग का प्रभाव बढ़ता गया. इसी दौर में ममता बनर्जी ने एक अलग राजनीतिक भाषा विकसित की. वह पारंपरिक राजनीतिक शिष्टाचार से अलग थीं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को लगा कि वह सत्ता प्रतिष्ठान और अभिजात वर्ग को चुनौती दे रही हैं. यही कारण था कि 2011 में तृणमूल कांग्रेस को व्यापक जनसमर्थन मिला.

 कुमार राणा ने कहा कि किसी दल को विधानसभा में भारी बहुमत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसे समाज के अधिकांश लोगों का समर्थन प्राप्त है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है. यही कारण है कि चुनावी जीत को समाज की सर्वसम्मत स्वीकृति मान लेना उचित नहीं होगा.

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