एसआईआर में काटे गए नाम: बंगाल के चार लोग छत्तीसगढ़ के डिटेंशन सेंटर में एक महीने से बंद

‘द हिंदू’ में सेंजुती सेनगुप्ता की रिपोर्ट है कि हाल ही में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान मतदाता सूची से नाम काटे जाने के बाद, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के चार प्रवासी मजदूर एक अजीबोगरीब स्थिति में फंस गए हैं. एक महीना बीत चुका है; पीढ़ियों से भारत में रहने वाले नागरिक होने के बावजूद बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में उन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस ने हिरासत में लेकर रायपुर के एक डिटेंशन सेंटर (निरोध केंद्र) में रखा हुआ है.

अगस्त के अंत में, मुर्शिदाबाद के समसेरगंज और साहाबाद इलाकों के सबीर शेख (42), शफिकुल इस्लाम (39), नासिरुद्दीन शेख (35) और लालटू शेख (28) सहित कम से कम 23 प्रवासी मजदूर काम की तलाश में छत्तीसगढ़ गए थे, जहाँ वे बिलासपुर क्षेत्र में घर-घर जाकर सामान भी बेच रहे थे.

4 सितंबर को, छत्तीसगढ़ पुलिस ने सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के चुनचियापारा-गणेश नगर स्थित उनके आवास से बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में 23 लोगों को हिरासत में लिया. उन्हें शुरुआत में बिलासपुर पुलिस अधीक्षक के कार्यालय ले जाया गया, जहाँ से उन्हें अवैध प्रवासियों के लिए बनाए गए रायपुर के एक होल्डिंग सेंटर में स्थानांतरित कर दिया गया.

एसआईआर के तहत हटाए गए नाम

बाद में, स्थानीय सिविल कोर्ट द्वारा आदेश पारित किए जाने के बाद 18 सितंबर को इन 23 में से 19 मजदूरों को रिहा कर दिया गया, जबकि ये चार पुरुष डिटेंशन सेंटर में ही बंद रहे. पुलिस ने अदालत में, एसआईआर अभ्यास के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर उनकी राष्ट्रीयता पर सवाल उठाया। दिलचस्प बात यह है कि अप्रैल में अपील प्रक्रिया के बाद बाकी 19 लोगों के नाम मतदाता सूची में वापस आ गए थे.

शफिकुल के 67 वर्षीय पिता रियाजुल शेख ने कहा, "मैं अपने बचपन से समसेरगंज में रह रहा हूँ. हमारा पुराना घर एक सदी पुराना था, जिसे संभवतः मेरे परदादा ने बनाया था. मिट्टी के कटाव के कारण इसके बह जाने के बाद, हमने 1973 में अपना नया आवास बनाया. हमारे पास इन दोनों मकानों के दस्तावेज़ हैं. मेरा बेटा बांग्लादेशी कैसे हो सकता है?"

रियाजुल और उनके सबसे बड़े बेटे रफिकुल के नाम मतदाता सूची में शामिल थे. लेकिन एसआईआर के बाद उनके दो अन्य बेटों—शफिकुल और आसिकुल—के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. उन्हें जारी किए गए नोटिसों में, भारत निर्वाचन आयोग ने एक 'तार्किक विसंगति' को चिह्नित किया कि छह अन्य लोगों ने भी रियाजुल को अपना पिता बताया है.

उन्होंने अब अपना नाम वापस जोड़ने की मांग को लेकर ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील की है. हालांकि, ये आवेदन अभी भी लंबित हैं.

सबीर के बड़े भाई मुस्तकीम शेख को भी छत्तीसगढ़ पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. "एसआईआर के बाद हम सभी के नाम मतदाता सूची में हैं. केवल मेरे भाई का नाम ही इसके लिए काटा गया था. हम अभी भी नाम शामिल करने की उसकी अपील पर ट्रिब्यूनल के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. राज्य ट्रिब्यूनल का फैसला आने से पहले यह कैसे तय कर सकता है कि वह अवैध नागरिक है?" मुस्ताकीम ने सवाल उठाया.

लालटू और नासिरुद्दीन के परिवारों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है.

इन चारों व्यक्तियों के परिजनों ने अब कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर छत्तीसगढ़ सरकार को बंदियों को रिहा करने का निर्देश देने की गुहार लगाई है. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ उनकी अपीलें ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित होने के बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया. इसलिए, अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई "पूर्णतः मनमानी, अवैध और कानून में टिकने योग्य नहीं है." वे काम के लिए अस्थायी रूप से छत्तीसगढ़ गए थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी 'स्थाई जड़ें' हैं.

दोहरा रवैया

सोमवार (5 सितंबर, 2026) को मामले की पहली सुनवाई के दौरान, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी राज्य के "दोहरे रवैये" की आलोचना की. अदालत ने कहा कि स्थिति "विरोधाभासी" थी. न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने सवाल किया, "यदि अधिकारी यह कह रहे थे कि कुछ व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं हैं, तो अपीलीय प्राधिकरण (ट्रिब्यूनल) क्या करेगा?"

उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या वह लोगों के साथ "खेल" कर रहा है. उच्चतम न्यायालय ने उन लोगों की अपीलों पर फैसला करने के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया है जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. अदालत ने पूछा कि विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी (एफआरआरओ) उनकी नागरिकता पर फैसला कैसे कर सकता है.

इस बीच, समसेरगंज के धूसरीपारा में गंगा नदी के पास अपने छोटे से ईंट के बने घर में, लालटू की पत्नी साबेरा खातून अपनी गोद में एक साल के बच्चे को लिए अपने पति का इंतजार कर रही हैं.

साबेरा ने कहा, "मैंने पिछले दो महीनों से उनकी आवाज नहीं सुनी है.  हमारे एक पड़ोसी, जो अभी भी छत्तीसगढ़ में काम कर रहे हैं, कुछ दिन पहले डिटेंशन सेंटर में उनसे मिलने गए थे. उन्होंने बताया कि वे केवल रो रहे थे और हमारे बच्चे के बारे में पूछ रहे थे. उन्हें वहाँ से किसी से मिलने या अपने परिवार को फोन करने की भी अनुमति नहीं है."

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