आकार पटेल | धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा

मेरा मानना है कि हिंदुत्व के राज में भारतीय राज्य पूरी तरह सांप्रदायिक नहीं बन पाया है. वह अधूरा सांप्रदायिक है. इस पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ. मूल बात यह है. 2008 से पहले नेपाल स्मृतियों में बताए गए विधान को क़ानून बनाकर, पूरे अर्थ में हिंदू राष्ट्र नहीं बन पाया था. यही बात हम पर भी लागू होती है. यह ढाँचे की समस्या है. और इसे सुलझाया नहीं जा सकता.

यही वजह है कि आदर्श राष्ट्र को लेकर गुरु गोलवलकर के विचार भाजपा के घोषणापत्रों में जगह नहीं पाते.

इसका मतलब यह भी है कि राज्य, यानी सरकारी तंत्र, अपने स्वभाव से धर्मनिरपेक्ष और सामान्य बने रहना चाहता है.

यह दिखता कैसे है? यह तब दिखता है जब सरकार बाहर की दुनिया से बात करती है. हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री विदेश जाते हैं. वहाँ वे दुनिया को उपदेश देते हैं और उससे तमग़े बटोरते हैं. पर वहाँ वे वह भाषा नहीं बोलते जो देश के भीतर बोलते हैं. वहाँ वे 'वसुधैव कुटुंबकम' और 'सर्वधर्म समभाव' की बात करते हैं. वे दुनिया को यह नहीं बताते कि देश में उनकी नीतियों में बुलडोज़र, बीफ़ के नाम पर लिंचिंग, सीएए, एनआरसी और लव जिहाद शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र और दूसरे मंचों पर वे नेहरूवादी खोल ओढ़कर जाते हैं. हरमिट क्रैब नाम का एक जीव होता है. उसका अपना कोई खोल नहीं होता. वह किसी मरे हुए जानवर का खोल अपनी हिफ़ाज़त के लिए इस्तेमाल करता है. दुनिया के सामने जाते वक़्त भाजपा नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के साथ यही करती है.

भाजपा बाहर जिस सार्वभौमिकता का प्रचार करती है, और जिसे मानने का नाटक करती है, वह देश के भीतर उसके कामों से टकराती है. यह पिछले कुछ बरसों में बने क़ानूनों में साफ़ दिखता है. 2015 में बीफ़ खाने को अपराध बनाया गया. 2018 में अंतरधार्मिक शादी को अपराध बनाया गया. 2019 में मुसलमानों में तलाक़ को अपराध बनाया गया. और सीएए से मुसलमानों को बाहर रखा गया.

इससे एक विरोधाभास पैदा होता है. यह हमें पाखंड के आरोपों के सामने कमज़ोर बना देता है. इससे हम पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ता है. अगर हम उन मूल्यों का ढिंढोरा न पीटते जिन पर हम असल में चलते ही नहीं, तो यह दबाव शायद धीमा रहता.

अगस्त 2019 में भारत ने कश्मीर में इंटरनेट बंद कर दिया. चार महीने बाद, 6 दिसंबर को, अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव आया. उसमें भारत से यह पाबंदी हटाने की माँग की गई थी. इसे भारतीय मूल की एक महिला सांसद ने लिखा था. उसी महीने जयशंकर वॉशिंगटन में थे. वहाँ उन्हें हाउस फ़ॉरेन अफ़ेयर्स कमेटी के सांसदों से मिलना था.

जयशंकर को पता चला कि प्रस्ताव लिखने वाली डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल भी बैठक में होंगी. यह जानकर उन्होंने बैठक में जाने से मना कर दिया. यह ट्रंप के पहले कार्यकाल की बात है. प्रस्ताव पेश तो हुआ, पर उस पर वोटिंग नहीं हुई. फिर ट्रंप चुनाव हार गए. जनवरी 2021 में बाइडन ने शपथ ली. और तब भारत ने यह पाबंदी हटा ली. क्यों? शायद इसलिए कि हमारी सरकार को लगा कि वह डेमोक्रेट्स का दबाव नहीं झेल पाएगी.

यूरोप में भी कुछ ऐसा ही हुआ. 28 जनवरी 2020 को यूरोपीय संसद के पाँच अलग-अलग समूहों ने एक प्रस्ताव पेश किया. इसमें नागरिकता संशोधन क़ानून, यानी सीएए, की कड़ी निंदा की गई थी. यहाँ के अख़बारों ने ख़बर दी कि प्रस्ताव के पास होने लायक़ समर्थन मौजूद था.

17 फ़रवरी को जयशंकर ब्रसेल्स गए, ताकि किसी तरह का समझौता हो सके. भीतर क्या बात हुई, यह हम नहीं जानते. क्योंकि यह सरकार पारदर्शी नहीं है. पर इतना ज़रूर हुआ कि प्रस्ताव पर वोट नहीं हुआ. और भारत में क़ानून पास हो जाने के बावजूद सरकार ने अगले चार साल तक उसे लागू नहीं किया.

कथनी और करनी का यह फ़र्क़, और इससे खड़ी होने वाली मुसीबत, दूसरी जगहों पर भी दिखती है. पिछले साल हमारे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, यानी एनएचआरसी, का दर्जा घटा दिया गया. यह काम राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के वैश्विक गठबंधन ने किया. उसने आयोग को 'ए' दर्जे से घटाकर 'बी' कर दिया. क्यों? इसकी मुख्य वजहें ये थीं. आयोग स्वतंत्र नहीं था. पुलिस की ज़्यादतियों की जाँच के लिए वह पुलिस पर ही निर्भर था. उसमें विविधता की कमी थी. और सरकार की तरफ़ से होने वाले व्यवस्थागत उल्लंघनों पर वह चुप रहा.

ये सारी आलोचनाएँ बेशक सही हैं. हमने दर्जा घटाए जाने के ख़िलाफ़ अपील की है. सुनवाई अगले कुछ दिनों में होनी है. लेकिन सिर्फ़ अपील करने के बजाय हमें अपना बर्ताव बदलने के बारे में सोचना चाहिए. ताकि हम पर यह आरोप न लगे कि हम वह होने का नाटक कर रहे हैं जो हम हैं ही नहीं.

उलटे होता यह है कि जब दुनिया इस विरोधाभास को देखती है, और बस उसकी तरफ़ इशारा करती है, तो सरकार चिढ़ जाती है. असहज हो जाती है. सरकार की प्रतिक्रियाओं के कुछ नमूने देखिए. फ़्रीडम हाउस ने कहा कि भारत सिर्फ़ 'आंशिक रूप से स्वतंत्र' है. 2021 में सरकार ने इसे 'भ्रामक, ग़लत और बेजा' बताया. इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने भारत को 'दोषपूर्ण लोकतंत्र' कहा. 2020 में सरकार ने इसे 'भ्रामक और धारणा पर आधारित' बताया. ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत नीचे खिसका. तो सरकार ने 2021 में इसे 'अवैज्ञानिक' पैमाना कहा. 2022 में इसे 'भारत को बदनाम करने की कोशिश' कहा. और 2023 में 'दोषपूर्ण पैमाना' कहा.

वैश्विक सूचकांकों में भारत की ख़राब रैंकिंग की मुख्य वजह आम तौर पर अल्पसंख्यकों पर निशाना साधकर किए गए हमले होते हैं. फिर भी सरकार कभी-कभी हैरान दिखती है. उसे समझ नहीं आता कि 'लोकतंत्र की जननी' को लोकतंत्र पर इतने कम नंबर क्यों मिलते हैं.

बात सीधी है. आज़ादी को व्यक्ति के अधिकारों और उसकी स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता. जो सरकार मान बैठी है कि लोकतंत्र का मतलब बस आज़ाद और निष्पक्ष चुनाव है, वह हमेशा बचाव की मुद्रा में आ जाएगी. ख़ासकर तब, जब उसे बताया जाएगा कि वह खरी नहीं उतर रही. वैसे चुनाव के मोर्चे पर भी हमने हाल में ज़मीन गँवाई है.

कुछ हद तक यह बात समझ में आती है. खाड़ी के देशों और उत्तर कोरिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दुनिया उन्हें अलोकतांत्रिक कहती है. क्योंकि उन्होंने कभी कुछ और होने का दावा ही नहीं किया. मुश्किल उनकी है जो ख़ुद को अगुआ बताकर पेश करते हैं. वे दुनिया से कहते हैं कि वे कुछ ऐसा हैं जो असल में वे हैं नहीं. और इस तरह ख़ुद को कमज़ोर बना लेते हैं.

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