जयश्री पिंगले | हिंदुत्व का ‘ब्लैंक चेक’ अब बाउंस होने लगा है 

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और संपादक जयश्री पिंगले के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सौ वर्ष पूरे होने, विजयादशमी पर मोहन भागवत के संबोधन और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में संघ की भूमिका पर चर्चा की. बातचीत में यह सवाल प्रमुखता से उठा कि क्या संघ अपने शताब्दी वर्ष में देश के सामने मौजूद राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों पर स्पष्ट रुख अपनाएगा या वैचारिक संकेतों के जरिए अपनी बात रखेगा.

जयश्री पिंगले के मुताबिक, आरएसएस विजयादशमी के अपने संबोधनों में आमतौर पर वैचारिक और सैद्धांतिक बातें करता है. उनका मानना है कि इस बार भी संघ प्रमुख मोहन भागवत से मोदी सरकार की नीतियों की स्पष्ट सार्वजनिक आलोचना की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा. पिंगले ने कहा कि संघ सीधे टकराव के बजाय संकेतों में अपनी बात रखने और परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने की रणनीति अपनाता रहा है.

उन्होंने भाजपा और आरएसएस के सार्वजनिक रुख में दिखाई देने वाले अंतर पर भी चर्चा की. पिंगले के अनुसार, जब भाजपा को जनता के बीच राजनीतिक नुकसान होता दिखाई देता है, तब संघ एक मार्गदर्शक संस्था की भूमिका में सामने आता है. उनके आकलन में, भाजपा और नरेंद्र मोदी की छवि जहां सख्त दिखाई देती है, वहीं संघ अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए अपेक्षाकृत नरम भाषा का इस्तेमाल करता है. उन्होंने इसे राजनीतिक नुकसान की भरपाई की कोशिश के रूप में देखा.

बातचीत में जंतर-मंतर पर युवाओं के विरोध प्रदर्शन, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नाम हटाए जाने, मणिपुर की स्थिति, पेपर लीक और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों का भी उल्लेख हुआ. पिंगले ने सवाल उठाया कि क्या संघ इन विषयों पर अपना रुख स्पष्ट करेगा या केवल सामान्य वक्तव्यों तक सीमित रहेगा.

आरएसएस की सौ साल की यात्रा का आकलन करते हुए पिंगले ने कहा कि संगठन ने अपने कई प्रमुख वैचारिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाया है. उनके अनुसार, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर भाजपा की उपलब्धियों को संघ की वैचारिक परियोजना के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच हिंदुत्व की स्वीकार्यता बढ़ना संघ के प्रभाव का संकेत है.

हालांकि, पिंगले के मुताबिक, अब संघ के सामने अपनी राजनीतिक और वैचारिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती है. उन्होंने जंतर-मंतर पर युवाओं की सक्रियता और राम मंदिर से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदुत्व के आधार पर मिलने वाला समर्थन हमेशा स्थायी नहीं माना जा सकता. उनके विचार में, आने वाले समय में संघ को यह तय करना होगा कि वह अपनी पुरानी रणनीति जारी रखेगा या नई पीढ़ी की आकांक्षाओं और सवालों का सामना करेगा.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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