विद्याधर दाते | भारत में जेन जी के प्रदर्शन शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक, फ्रांस की हिंसा से करें तुलना

‘काउंटरकरंट्स’ में विद्याधर दाते  ने लिखा है कि भारत में जेन जी के विरोध प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बताते हुए सरकार और कुछ शिक्षाविदों के रवैये की आलोचना की गई है. लेखक का तर्क है कि भारत में युवाओं ने लंबे समय से चले आ रहे अन्याय के बावजूद संयमित तरीके से विरोध किया है, लेकिन अधिकारियों ने उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया.

लेख के मुताबिक, दिल्ली में हालिया युवा प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो सेवाएं बंद की गईं और जंतर-मंतर के आसपास सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए. लेखक सवाल उठाते हैं कि जब प्रदर्शनकारी निहत्थे छात्र थे, तब प्रशासन ने इतनी सख्ती क्यों दिखाई. इसके विपरीत, फ्रांस और इटली तथा पुर्तगाल के कुछ हिस्सों में हालिया हिंसक प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं कि यूरोप में आम लोग बिगड़ती परिस्थितियों से परेशान होकर अधिक उग्र विरोध कर रहे हैं, जबकि भारत में लंबे समय से अन्याय झेलने के बावजूद प्रदर्शन अपेक्षाकृत शांत रहे हैं.

शिक्षाविदों पर आलोचना और बौद्धिक जिम्मेदारी का सवाल

लेखक ने प्रमुख विश्वविद्यालयों से जुड़े कुछ शिक्षाविदों की आलोचना की है. उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों के व्यवहार पर सवाल उठाने वाले इन शिक्षाविदों ने पुलिस की कथित बर्बरता, सरकार की भूमिका और लोकतांत्रिक मानदंडों के कमजोर होने जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. लेखक इसे पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति बताते हैं.

उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के विचार पृष्ठ पर प्रकाशित सुमित अग्रवाल और शाश्वत आलोक के लेख का उल्लेख किया है. इसके अलावा, मोदी सरकार की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य सुरजीत भल्ला की जेन जी और अन्य प्रदर्शनकारियों पर की गई आलोचना पर भी सवाल उठाए हैं.

अपने तर्क को स्पष्ट करने के लिए लेखक जूलियन बेंदा की 1927 में प्रकाशित पुस्तक ला त्रैज़ों दे क्लर्क का संदर्भ देते हैं. इस पुस्तक में बेंदा ने उन बुद्धिजीवियों की आलोचना की थी, जो न्याय और विवेक जैसे सार्वभौमिक मूल्यों के बजाय राजनीतिक, राष्ट्रवादी या वर्गीय हितों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं. लेखक थॉमस डॉचेर्ट की 2018 की पुस्तक द न्यू ट्रेजन ऑफ द इंटेलेक्चुअल्स का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें विश्वविद्यालयों के राजनीतिकरण, ज्ञान के व्यावसायीकरण और सामाजिक जिम्मेदारियों से संस्थानों के दूर होने की चर्चा है.

शेक्सपियर और सत्ता के पतन का संदर्भ

लेख में शेक्सपियर के नाटक मैकबेथ की प्रसिद्ध पंक्ति “फुल ऑफ साउंड एंड फ्यूरी, सिग्निफाइंग नथिंग” का भी जिक्र है. लेखक का कहना है कि इस पंक्ति को प्रदर्शनकारियों पर लागू करना संदर्भ से हटकर होगा, क्योंकि नाटक में यह सत्ता और हिंसा के रास्ते पर चलने वाले मैकबेथ के मोहभंग को व्यक्त करती है. उनके अनुसार, युवा प्रदर्शनकारी सत्ता हासिल करने के बजाय एक अलोकतांत्रिक व्यवस्था का सामना करने का साहस दिखा रहे हैं.

अंत में लेखक अकीरा कुरोसावा की 1957 की फिल्म थ्रोन ऑफ ब्लड के दृश्य का उल्लेख करते हैं, जिसमें विद्रोही सैनिकों के तीरों से घिरा शासक अपने पतन का सामना करता है. इस उदाहरण के जरिए वह सत्ता के अहंकार और उसके अंत की ओर संकेत करते हैं.

लेख का केंद्रीय तर्क है कि युवाओं के विरोध को केवल अव्यवस्था या निरर्थक शोर बताने के बजाय उनकी शिकायतों, लोकतांत्रिक अधिकारों और सरकार की जवाबदेही पर चर्चा होनी चाहिए. लेखक के अनुसार, भारत में लोगों ने पहले ही बहुत कम विरोध किया है; ऐसे में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाने या प्रदर्शनकारियों को दोष देने के बजाय उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए.

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