जींस जिहाद: कैसे एक राजनीतिक नैरेटिव ने दिल्ली के ख्याला बाज़ार को संकट में धकेल दिया
‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में स्थित ख्याला कभी एक साधारण बस्ती हुआ करती थी. धीरे-धीरे यह इलाका देश के बड़े जींस निर्माण केंद्रों में बदल गया. लोग इसे “जींस मार्केट” के नाम से जानने लगे.
यह बाज़ार उन प्रवासी मज़दूरों और छोटे कारोबारियों की मेहनत से बना था जो उत्तर प्रदेश और बिहार से रोज़गार की तलाश में दिल्ली आए थे. इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम कारीगरों की थी. उन्होंने छोटे कारखानों और सिलाई मशीनों के दम पर ख्याला को डेनिम व्यापार का बड़ा केंद्र बना दिया.
65 वर्षीय क़ासिम ख़ान भी उन्हीं लोगों में हैं. वे 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए थे. पहले दर्ज़ी का काम किया और फिर 1997 में ख्याला में छोटा जींस निर्माण यूनिट शुरू किया.
क़ासिम बताते हैं कि जब वे यहां आए थे तब ख्याला मार्केट में मुश्किल से कुछ दुकानें थीं. समय के साथ कारोबार बढ़ता गया और आज यहां करीब 3000 कारोबारी जींस निर्माण और सप्लाई से जुड़े हैं. गुजरात से डेनिम कपड़ा आता है और यहां तैयार होकर देशभर के बाज़ारों में भेजा जाता है. कुछ माल श्रीलंका तक जाता है.
हालांकि बाज़ार की शुरुआत मुस्लिम कारोबारियों ने की थी, लेकिन यहां हिंदू और सिख व्यापारी भी लंबे समय से काम करते रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ दशकों तक यहां किसी तरह का सांप्रदायिक तनाव नहीं था.
लेकिन 2024 के दिल्ली चुनावों के दौरान ख्याला अचानक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया. भाजपा नेता और राजौरी गार्डन से विधायक मंजिंदर सिंह सिरसा ने ख्याला के कारोबारियों पर “जींस जिहाद” चलाने का आरोप लगाया. उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम कारोबारी इलाके पर कब्ज़ा कर रहे हैं और स्थानीय लोगों को डराकर भगा रहे हैं.
सिरसा ने यह भी कहा कि उन्होंने खुद कई फैक्ट्रियां बंद करवाईं और “इन लोगों” को इलाके से बाहर किया. बाद में कुछ हिंदी मीडिया चैनलों ने भी “जींस जिहाद” वाले नैरेटिव को तेज़ी से फैलाया.
स्थानीय कारोबारी इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं.
40 वर्षीय बासित ख़ान, जो 2005 से इस कारोबार से जुड़े हैं, कहते हैं कि यहां काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं. उनके मुताबिक़ “यह सिर्फ़ सांप्रदायिक माहौल बनाकर कारोबार खत्म करने की कोशिश है.”
2025 में भाजपा सरकार बनने के बाद प्रशासन ने ख्याला की कई फैक्ट्रियों पर कार्रवाई शुरू की. जून 2025 में करीब 200 से 300 यूनिट सील कर दी गईं. आरोप था कि वे अवैध रूप से चल रही थीं और प्रदूषण फैला रही थीं.
कारोबारियों का कहना है कि कार्रवाई और राजनीतिक बयानबाज़ी ने पूरे बाज़ार को तोड़ दिया.
क़ासिम ख़ान बताते हैं कि अब उनके पास सिर्फ़ कुछ जींस का स्टॉक बचा है. पहले इतना माल सिर्फ़ ग्राहकों को दिखाने के लिए रखा जाता था, लेकिन अब वही बेचकर गुज़ारा चल रहा है.
बासित ख़ान कहते हैं कि पहले उनका कारोबार हर महीने 8 से 10 हज़ार जींस बेचता था और उनकी कमाई 70 से 90 हज़ार रुपये तक होती थी. अब फैक्ट्री बंद है और आमदनी घटकर लगभग 10 हज़ार रुपये रह गई है.
इसका सबसे बड़ा असर मज़दूरों पर पड़ा है. जींस सिलने, ज़िप लगाने और बटन लगाने वाले मज़दूर पहले रोज़ 1200 से 1500 रुपये तक कमा लेते थे. अब कई लोग मुश्किल से 250-300 रुपये कमा पा रहे हैं.
नरेंद्र कुमार, जो ख्याला में बटन लगाने का काम करते हैं, कहते हैं कि पहले काम लगातार मिलता था, लेकिन अब वे गांव लौटने की सोच रहे हैं. उनका कहना है, “मेहनत करके रोज़ी कमाना कब से जिहाद हो गया?”
इस संकट का असर सिर्फ़ फैक्ट्री मालिकों तक सीमित नहीं रहा. चाय की दुकानें, ढाबे और किराना स्टोर भी प्रभावित हुए हैं.
राहुल कुमार उर्फ़ बंटी पिछले 15 साल से यहां चाय की दुकान चलाते हैं. वे कहते हैं कि पहले दुकान पर बैठने की फुर्सत नहीं मिलती थी, लेकिन अब ग्राहक ही नहीं आते. उनके मुताबिक़ “ख्याला कभी परिवार जैसा इलाक़ा था, लेकिन अब सब बदल गया.”
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ख्याला की घटना कोई अकेली घटना नहीं है. हाल के वर्षों में देश के कई हिस्सों में मुस्लिम व्यापारियों के आर्थिक बहिष्कार की मांगें उठी हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता आसिफ मुजतबा कहते हैं कि दंगे हों, आर्थिक बहिष्कार हो या ख्याला जैसे बाज़ारों को निशाना बनाना, मक़सद मुसलमानों को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना है.
आज ख्याला में कई दुकानें बंद हैं, मज़दूर गांव लौट चुके हैं और कारोबार लगभग ठहर गया है.
क़ासिम ख़ान अब भी उम्मीद करते हैं कि कभी न कभी पुराना ख्याला लौटेगा. ऐसा ख्याला जहां लोगों की पहचान उनके धर्म से नहीं, बल्कि उनकी मेहनत से होती थी.

