तरुण तेजपाल, बृजभूषण और यौन हिंसा के मामलों में अदालतों के सामने सवाल: संदेह पैदा किस वजह से होता है?
‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित आदित्य कृष्ण के रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने देश की प्रमुख महिला पहलवानों द्वारा पूर्व भाजपा सांसद और कुश्ती प्रशासक बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज कर दिया. अगस्त 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पत्रकार तरुण तेजपाल को बलात्कार मामले में बरी करने वाले निचली अदालत के फैसले को पलट दिया. दोनों मामलों के तथ्य और कानूनी सवाल अलग हैं, लेकिन दोनों एक व्यापक सवाल उठाते हैं: यौन हिंसा के मामलों में अदालत को मिलने वाला संदेह वास्तव में सबूत से पैदा होता है या महिलाओं के व्यवहार को लेकर बनी सामाजिक धारणाओं से?
आपराधिक कानून में अभियोजन को आरोपी का अपराध उचित संदेह से परे साबित करना होता है. यह आरोपी के निर्दोष माने जाने और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की बुनियादी सुरक्षा है. लेकिन हर संदेह उचित नहीं होता. किसी व्यक्ति पर केवल इसलिए संदेह नहीं किया जा सकता कि वह अपराधी जैसा दिखाई देता है या समाज उसे अपराध करने में असमर्थ मानता है. संदेह को प्रमाण से जुड़ा होना चाहिए.
यौन हिंसा के मामलों में चुनौती अधिक कठिन होती है क्योंकि अक्सर कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं होता. कई मामलों में शिकायतकर्ता ही घटना की एकमात्र गवाह होती है. 1994 में धनंजय चटर्जी का मामला इसका उदाहरण था, जिसमें बलात्कार और हत्या की दोषसिद्धि परिस्थितिजन्य प्रमाणों पर आधारित थी और बाद में उन प्रमाणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे.
भारतीय कानून के अनुसार यौन अपराध की शिकायतकर्ता की गवाही को केवल इसलिए अतिरिक्त पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह अकेली गवाह है. यदि अदालत उसकी गवाही को विश्वसनीय पाती है तो अकेली गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि हो सकती है. 2021 का सुप्रीम कोर्ट का फूल सिंह फैसला इसका उदाहरण है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि शिकायतकर्ता की गवाही स्वतः सत्य मान ली जाए. अदालत को उसकी विश्वसनीयता की जांच करनी ही होती है.
असली सवाल है कि अविश्वास का आधार क्या है
समस्या तब पैदा होती है जब सामाजिक रूढ़ियां प्रमाण का रूप लेने लगती हैं. एक सामान्य धारणा बनाई जाती है कि ‘वास्तविक पीड़िता’ घटना के बाद तुरंत शिकायत करेगी, आरोपी से संपर्क तोड़ देगी, शहर छोड़ देगी या लगातार आघात में दिखाई देगी. फिर यदि शिकायतकर्ता ऐसा नहीं करती, तो उसके बयान पर संदेह किया जाता है.
तरुण तेजपाल मामले में निचली अदालत ने शिकायतकर्ता के घटना के बाद गोवा में रहने, तेजपाल से संपर्क बनाए रखने और तस्वीरों में सामान्य या खुश दिखाई देने जैसे व्यवहारों पर विचार किया. बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसे तर्कों को ‘आदर्श पीड़िता’ की धारणा से जोड़कर देखा. अदालत का महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या इन व्यवहारों का कथित घटना के साथ वास्तविक प्रमाणिक संबंध है.
यदि कोई महिला घटना के बाद भी आरोपी से बात करती रही, तो यह एक तथ्य है. बातचीत की सामग्री महत्वपूर्ण हो सकती है. लेकिन केवल संपर्क जारी रहने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यौन हिंसा हुई ही नहीं. आरोपी यदि नियोक्ता, शिक्षक, वरिष्ठ अधिकारी या किसी प्रभावशाली स्थिति में हो तो आर्थिक निर्भरता, पेशेवर भविष्य, सामाजिक दबाव या बदले का डर महिला को संपर्क बनाए रखने के लिए मजबूर कर सकता है.
इसी तरह शिकायत दर्ज कराने में देरी भी अपने आप झूठ का प्रमाण नहीं है. देरी को संदेह का आधार बनाने के लिए पहले यह मानना पड़ेगा कि हर वास्तविक पीड़िता तुरंत शिकायत करती है. इसी तरह किसी महिला का शांत, सामान्य, गुस्से में या भावुक दिखाई देना भी अपने आप उसकी गवाही की सच्चाई तय नहीं करता.
विरोधाभास और रूढ़ि में अंतर
अदालतों को विरोधाभासों की जांच करनी चाहिए, लेकिन हर अंतर महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं होता. यदि किसी महिला के दो बयान कथित घटना के मूल स्वरूप को अलग-अलग तरीके से बताते हैं, तो अदालत को उसका महत्व तय करना होगा. लेकिन वर्षों बाद दर्ज किए गए बयान में स्मृति के कारण आया मामूली अंतर अपने आप पूरे बयान को झूठा नहीं बनाता.
तेजपाल मामले में निचली अदालत ने शिकायतकर्ता के अलग-अलग बयानों, दृश्य प्रमाण, लिफ्ट से संबंधित सामग्री, क्षमायाचना वाले ईमेल, इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणों की जांच और जांच की कमियों को देखते हुए सामूहिक संदेह के आधार पर बरी किया. हाईकोर्ट ने कई कथित विरोधाभासों को मामूली अंतर या स्वाभाविक भिन्नता माना और दृश्य प्रमाण तथा ईमेल सहित अन्य परिस्थितियों की अलग व्याख्या की.
यहां नारीवादी आपत्ति यह नहीं है कि अदालतें विरोधाभासों को नजरअंदाज करें. आपत्ति उस स्थिति में है जब किसी महिला के व्यवहार को इसलिए संदेहास्पद माना जाए क्योंकि वह न्यायाधीश की कल्पना में मौजूद ‘सच्ची पीड़िता’ के व्यवहार से मेल नहीं खाता.
मृणाल सतीश के शोध और प्रतीका बक्सी के लेखन से भी यही सवाल सामने आता है कि यौन हिंसा के मुकदमों में समाज की धारणाएं किस तरह अदालत तक पहुंचती हैं. ‘सच्ची पीड़िता ऐसी ही प्रतिक्रिया देती है’ जैसी धारणा यदि प्रमाण और निष्कर्ष के बीच जरूरी कड़ी बन जाए, तो पूर्वाग्रह सामान्य समझ का रूप ले लेता है.
ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में न्यायिक निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि यौन हिंसा के बाद कोई एक सामान्य व्यवहार नहीं होता. इंग्लैंड और वेल्स में यौन इतिहास से जुड़े प्रमाणों के इस्तेमाल पर सीमाएं हैं. दक्षिण अफ्रीका में भी यौन अपराधों की शिकायतकर्ताओं को स्वभावतः संदिग्ध मानने वाली विशेष सावधानी की धारणा को खारिज किया गया है.
निष्पक्ष सुनवाई दोनों पक्षों के लिए है
नारीवादी आपराधिक न्याय व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि यौन हिंसा के आरोप के बाद दोषसिद्धि सुनिश्चित कर दी जाए. आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और उचित संदेह का लाभ मिलना चाहिए. यदि महत्वपूर्ण विरोधाभास, असंभव घटनाक्रम, वस्तुनिष्ठ प्रमाणों का विरोध या गंभीर जांच संबंधी कमी अभियोजन के मामले को कमजोर करती है, तो बरी किया जाना न्याय प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है.
लेकिन निष्पक्षता का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. महिला को अपराध साबित करने के बाद यह साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि वह ‘वैसी पीड़िता’ है जिसके साथ ऐसा अपराध हो सकता है. आरोपी को प्रमाण से पैदा होने वाले उचित संदेह का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन लैंगिक रूढ़ियों से पैदा हुए संदेह का नहीं.
इसीलिए न्यायिक प्रशिक्षण, संसाधन और पेशेवर नैतिकता महत्वपूर्ण हैं. जब तथ्य तय करने की जिम्मेदारी जूरी से हटाकर न्यायाधीशों को दी गई, तब न्यायिक प्रशिक्षण पर भी अधिक गंभीरता अपेक्षित थी. कानून की पढ़ाई और न्यायिक अकादमियों में आपराधिक मुकदमों, प्रमाणों और लैंगिक रूढ़ियों की समझ को मजबूत करना जरूरी है.
अंततः तरुण तेजपाल और बृजभूषण शरण सिंह के मामलों से बड़ा सवाल व्यवस्था का है: संदेह पैदा किस चीज से होता है? यदि संदेह महत्वपूर्ण विरोधाभास, प्रमाण की कमजोरी या जांच की वास्तविक कमी से पैदा हुआ है, तो वह उचित है. लेकिन यदि उसके पीछे यह धारणा है कि ‘वास्तविक पीड़िता ऐसा व्यवहार नहीं करती’, तो वह न्यायिक प्रमाण नहीं बल्कि सामाजिक रूढ़ि है.
आपराधिक दोषसिद्धि के लिए उचित संदेह से परे प्रमाण जरूरी है और ऐसा ही होना चाहिए. लेकिन अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस संदेह के आधार पर किसी आरोपी को लाभ दिया जा रहा है, वह वास्तव में उचित संदेह हो, महिलाओं के व्यवहार को लेकर बनी धारणाओं से पैदा हुआ संदेह नहीं.
आदित्य कृष्ण दिल्ली स्थित वकील, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.

