अयोध्या में जमीन के सौदों से नेताओं के रिश्तेदारों और करीबियों को बड़ा मुनाफा
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जमीन खरीदने के दौरान नेताओं और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों के रिश्तेदारों तथा करीबियों को जमीन के सौदों से बड़ा मुनाफा मिलने का सिलसिला सामने आया है. ‘स्क्रोल’ की पड़ताल के मुताबिक, मंदिर ट्रस्ट को जमीन बेचने वालों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक नेता, समाजवादी पार्टी के एक वार्ड प्रत्याशी की पत्नी, सपा नेता के भतीजे की पत्नी और अयोध्या के पूर्व भाजपा महापौर के रिश्तेदारों से जुड़े लोग शामिल हैं.
मामला पहली बार 2021 में चर्चा में आया था. फरवरी 2021 में अयोध्या के तत्कालीन भाजपा महापौर ऋषिकेश उपाध्याय के भतीजे ने 20 लाख रुपये में जमीन खरीदी. केवल तीन महीने बाद वही जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को 2.5 करोड़ रुपये में बेच दी गई. यानी खरीद मूल्य से करीब 12 गुना अधिक कीमत मिली. इसके बाद ऐसी कई जमीन खरीद-बिक्री की खबरें सामने आईं, जिनमें राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदारों ने कम कीमत पर जमीन खरीदी और थोड़े समय बाद उसे मंदिर ट्रस्ट को कई गुना अधिक कीमत पर बेच दिया.
इन खबरों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने राजस्व विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच समिति बनाई थी. हालांकि समिति की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. नई पड़ताल से पता चलता है कि जांच और सार्वजनिक विवाद के बावजूद अयोध्या में जमीन के ऐसे सौदे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं. अब खरीद और मंदिर ट्रस्ट को दोबारा बिक्री के बीच का अंतर कुछ वर्षों का हो गया है.
पड़ताल का प्रमुख केंद्र बाग बिजैसी गांव है, जो राम मंदिर से करीब तीन किलोमीटर दूर है. राम मंदिर ट्रस्ट ने यहां तीर्थ क्षेत्र पुरम के लिए जमीन खरीदी है. यह परिसर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों तथा मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस्तेमाल होता है.
सपा वार्ड प्रत्याशी की पत्नी को 11 गुना कीमत
जनवरी 2020 में विश्व मोहिनी चौबे ने बाग बिजैसी में 621.66 वर्गमीटर जमीन 9 लाख रुपये में खरीदी. उस समय जमीन की सर्किल रेट 29.8 लाख रुपये थी. पांच साल बाद अप्रैल 2025 में उन्होंने यही जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को 98.2 लाख रुपये में बेच दी. यानी उन्हें खरीद मूल्य से करीब 11 गुना रकम मिली.
विश्व मोहिनी चौबे, अयोध्या के देवकली वार्ड से 2023 नगर निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रहे प्रदीप चौबे की पत्नी हैं. प्रदीप चौबे ने पहले सपा से अपना संबंध स्वीकार किया, लेकिन जमीन सौदे पर सवाल पूछे जाने पर पार्टी से संबंध से इनकार किया. उन्होंने कहा कि जमीन पत्नी के नाम इसलिए खरीदी गई थी क्योंकि महिलाओं के लिए स्टांप ड्यूटी कम है. उनका दावा था कि जमीन बच्चों के भविष्य के लिए निवेश के तौर पर खरीदी गई थी और बाद में राम मंदिर ट्रस्ट ने आसपास की जमीन खरीदनी शुरू की तो उन्होंने धार्मिक आस्था के कारण इसे बेच दिया.
एबीवीपी नेता ने जमीन चार गुना कीमत पर बेची
दिसंबर 2021 में मंतोष मौर्य ने बाग बिजैसी में 277 वर्गमीटर जमीन 13.3 लाख रुपये में खरीदी. जनवरी 2025 में, करीब चार साल बाद, उन्होंने इसे राम मंदिर ट्रस्ट को 50 लाख रुपये में बेच दिया. यानी खरीद कीमत से करीब चार गुना अधिक.
मंतोष मौर्य देवरिया में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नगर अध्यक्ष हैं. एबीवीपी आरएसएस का छात्र संगठन है. मौर्य ने बताया कि उन्होंने जमीन बच्चों के लिए खरीदी थी. उनके अनुसार, ट्रस्ट इलाके में जमीन खरीद रहा था, लेकिन वह अपनी जमीन बेचना नहीं चाहते थे. बाद में ट्रस्ट की खरीद के कारण जमीन तक पहुंच मुश्किल हो गई और करीब डेढ़ साल के संघर्ष के बाद उन्हें जमीन बेचनी पड़ी.
सपा नेता के भतीजे के परिवार को तीन गुना कीमत
दिसंबर 2021 में शिखा गुप्ता ने बाग बिजैसी में 833 वर्गमीटर जमीन 40 लाख रुपये में खरीदी. नवंबर 2023 में, दो साल से कम समय बाद, उन्होंने इसमें से 763.3 वर्गमीटर जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को 1.14 करोड़ रुपये में बेच दी. यानी करीब तीन गुना कीमत.
शिखा गुप्ता, उत्तर प्रदेश में सपा के व्यापार सभा के प्रदेश सचिव नंद कुमार गुप्ता के भतीजे अमित गुप्ता की पत्नी हैं. अमित गुप्ता ने रिश्ते की पुष्टि की और बताया कि जमीन आवासीय उद्देश्य से खरीदी गई थी. उनके अनुसार, गांव में ट्रस्ट द्वारा जमीन खरीदे जाने के दौरान उन्हें भी जमीन बेचने का प्रस्ताव मिला और उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया.
पूर्व भाजपा महापौर के करीबियों से जुड़े सौदे
मार्च 2021 में हरीश और कुसुम पाठक ने बाग बिजैसी में 890 वर्गमीटर जमीन रविंद्र दुबे को उपहार के रूप में दी. दुबे ने इसके लिए कोई रकम नहीं चुकाई. ढाई साल बाद अक्टूबर 2023 में दुबे ने इसी संपत्ति के 510 वर्गमीटर हिस्से को राम मंदिर ट्रस्ट को 54.9 लाख रुपये में बेच दिया. इस हिस्से की बाजार कीमत करीब 24.5 लाख रुपये बताई गई थी, यानी बिक्री मूल्य बाजार कीमत से दोगुने से भी अधिक था.
रविंद्र दुबे, पूर्व भाजपा महापौर ऋषिकेश उपाध्याय से जुड़े एक पुराने विवादित जमीन सौदे में शामिल रहे रवि मोहन तिवारी के बहनोई हैं. 2021 में पाठकों ने बाग बिजैसी में एक जमीन तिवारी और सुल्तान अंसारी को 2 करोड़ रुपये में बेची थी. कुछ ही मिनट बाद दोनों ने वही जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को 18.5 करोड़ रुपये में बेच दी थी. यानी कीमत नौ गुने से ज्यादा बढ़ गई थी.
रविंद्र दुबे ने पहले रवि मोहन तिवारी के साथ अपने रिश्ते की पुष्टि की, लेकिन जमीन सौदों के बारे में सवाल पूछे जाने पर रिश्ते से इनकार कर दिया. उन्होंने माना कि इन सौदों से उन्होंने पैसा कमाया है. दूसरी ओर तिवारी और ऋषिकेश उपाध्याय के बीच भी पारिवारिक संबंध बताया गया है. तिवारी के भतीजे की शादी उपाध्याय की भतीजी से हुई है. उपाध्याय ने इस रिश्ते को बहुत दूर का बताते हुए कहा कि अगर इस तरह रिश्ते जोड़े जाएं तो पूरा अयोध्या उनका रिश्तेदार हो जाएगा.
इसी नेटवर्क से जुड़े एक और सौदे में मार्च 2022 में आत्माराम ने 122.67 वर्गमीटर जमीन प्रभाकर तिवारी को 23.8 लाख रुपये में और 155.205 वर्गमीटर जमीन विश्व प्रताप उपाध्याय तथा राजेंद्र प्रसाद यादव को 7.45 लाख रुपये में बेची. नवंबर 2023 में तीनों ने संयुक्त रूप से यह जमीन राम मंदिर ट्रस्ट को 37.8 लाख रुपये में बेच दी.
विश्व प्रताप उपाध्याय ने बताया कि वह रवि तिवारी के रिश्तेदार हैं और राजेंद्र प्रसाद यादव के साथ रियल एस्टेट का कारोबार करते हैं. यादव ने भी तिवारी के साथ अपने पड़ोसी और पारिवारिक परिचय की पुष्टि की. उनका कहना था कि उन्होंने जमीन घर बनाने के लिए खरीदी थी, लेकिन ट्रस्ट द्वारा आसपास की जमीन खरीदने के बाद वहां पहुंचना मुश्किल हो गया और उन्हें जमीन बेचनी पड़ी.
इन सौदों में शामिल लोगों का कहना है कि उन्होंने जमीन निवेश, आवास या अपनी सुविधा के कारण खरीदी और बाद में राम मंदिर ट्रस्ट के प्रस्ताव पर बेच दी. लेकिन इन मामलों में खरीद और बिक्री की कीमतों के बीच बड़ा अंतर, राजनीतिक और संगठनात्मक संबंध तथा मंदिर ट्रस्ट की जमीन खरीद की प्रक्रिया लगातार सवाल खड़े करती है.
2021 में सामने आए विवादों के बाद सरकार ने जांच तो शुरू की, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है. इस बीच बाग बिजैसी के रिकॉर्ड बताते हैं कि राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों से जुड़े व्यक्तियों को राम मंदिर ट्रस्ट को जमीन बेचकर कई गुना मुनाफा मिलने का सिलसिला अलग-अलग समय अंतराल के साथ जारी रहा.

