अशोक लवासा | भारत निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता का बढ़ता संकट

क्या भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) मुहावरेदार रूप से और संस्थागत तौर पर असमंजस व उथल-पुथल की स्थिति से गुजर रहा है? क्या 'फॉर्म 6' इसकी साख के पतन का कारण बनेगा, और क्या 'फॉर्म 7' के अनुचित उपयोग ने इसके लिए असहज स्थितियाँ पैदा कर दी हैं? इन फार्मों से जुड़े विवादों ने "हम, भारत के लोग" के संवैधानिक मताधिकार की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठाने वाली इस शीर्ष संवैधानिक संस्था की छवि को गहरा आघात पहुँचाया है.

अशोक लवासा के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग को जनता का अटूट विश्वास अर्जित करने में दशकों की अनवरत मेहनत और पारदर्शिता लगी थी. हालाँकि, हाल के दिनों में आयोग को जिस तरह के तीखे जन-आक्रोश, मीडिया जांच और सामाजिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है, वैसा इतिहास में कभी नहीं देखा गया. संस्था के शीर्ष पदों पर बैठे कुछ व्यक्तियों के अड़ियल रवैये ने उन सभी नागरिकों की वाजिब चिंताओं को खारिज कर दिया, जो कभी इस संस्था की निष्पक्षता की कसम खाते थे.

जिस संस्थान को ईंट-दर-ईंट सहेजकर बनाया गया था, वह आज उसी तरह ढहता हुआ प्रतीत हो रहा है. हालिया वर्षों में आयोग का रिकॉर्ड एक बेहद निराशाजनक ढर्रा पेश करता है. जैसे:

पक्षपातपूर्ण रवैया: 2019 और 2024 के आम चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघनों पर सत्तारूढ़ दल के स्टार प्रचारकों को छूट देना और विपक्षी दलों पर सख्ती बरतना.

पारदर्शिता का अभाव: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पूर्ण प्रकटीकरण का आदेश दिए जाने के बाद, दिसंबर 2024 में नियमों में जल्दबाज़ी में संशोधन कर मतदान के बाद की वीडियो फुटेज को सार्वजनिक करने से रोकना.

संस्थागत अहंकार: संसद में विपक्ष के नेता द्वारा मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों पर उठाई गई शिकायतों को गैर-संजीदगी से खारिज करना और उनसे हलफनामा मांगने जैसी असामान्य बयानबाज़ी करना.

अनावश्यक नीतियाँ: जून 2025 में देश के लगभग एक अरब मतदाताओं पर 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) की आक्रामक और अवांछित प्रक्रिया को अचानक थोप देना.

मानो आयोग की अपनी कार्यशैली ही उसकी साख खत्म करने के लिए काफी नहीं थी, दिसंबर 2023 में सरकार ने आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा एक ऐसा कानून पारित कर दिया जिसने शुरुआत से ही उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए. इसके अलावा, जब भी आयोग की आलोचना हुई, सत्तारूढ़ दल का उसके बचाव में उतरना आयोग की स्वायत्तता को और संदिग्ध बना देता है.

लवासा लिखते हैं कि ताजा विवाद में निर्वाचन आयोग पर केवल सत्तारूढ़ दल का पक्ष लेने का ही आरोप नहीं है, बल्कि खुद उसके साथी चुनाव आयुक्तों ने उस पर "गैर-कानूनी" फैसलों के आरोप लगाए हैं. ये विवाद मुख्य रूप से 'फॉर्म 6' में किए गए संशोधनों और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को 'ईसीआईनेट' का उपयोग करने से रोकने से जुड़े हैं.

निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत 'फॉर्म 6' नए मतदाताओं के नामांकन या क्षेत्र परिवर्तन का आवेदन पत्र है. इसके तहत केवल पहचान, जन्म तिथि, सामान्य निवास और नागरिकता की स्व-घोषणा अनिवार्य है. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत गलत जानकारी देना पहले से ही दंडनीय अपराध है.

इसके बावजूद, आयोग ने 24 जून, 2025 की अधिसूचना के जरिए एसआईआर प्रक्रिया के तहत एक अतिरिक्त 'घोषणा पत्र' (डी) जोड़ दिया. इसमें आवेदकों से उनकी नागरिकता सिद्ध करने वाले अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए, जो मौजूदा नियमों की सीमा से परे थे.  यही कारण है कि अन्य आयुक्तों ने इसे "अवैध एवं अनाधिकृत" करार दिया, जबकि आलोचकों ने इसे 'चोर दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने का प्रयास' माना.

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 28 के तहत नियम बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है; निर्वाचन आयोग एकतरफा रूप से फॉर्म में बदलाव करने के लिए सक्षम नहीं था. यहाँ तक कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी यह स्पष्ट करना पड़ा कि "अदालत द्वारा किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी गई है." आयोग का दो तरह के फॉर्म 6 लागू रखना—एसआईआर वाले राज्यों में घोषणा पत्र के साथ और अन्य राज्यों में बिना इसके—यह दर्शाता है कि वह चुनाव आयोग की परिधि से बाहर जाकर एक प्रकार का 'अर्ध-एनआरसी' निर्मित करने का प्रयास कर रहा है.

'फॉर्म 7' का दुरुपयोग और आंकड़ों का केंद्रीकरण

उत्तराखंड, कर्नाटक और अन्य राज्यों में मौजूदा वैध मतदाताओं के नाम हटाने के लिए 'फॉर्म 7' के जरिए थोक में आवेदन जमा किए जा रहे हैं.  फर्जी या बेबुनियाद आपत्तियाँ दर्ज कराने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही न करके आयोग अपनी निष्पक्षता की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रहा है.

इसके साथ ही, आयोग द्वारा आंकड़ों के अति-केंद्रीकरण ने हेरफेर की आशंकाओं को गहरा दिया है. पश्चिम बंगाल और गोवा के ईआरओ  तथा बीएलओ की शिकायतों से स्पष्ट होता है कि एक केंद्रीकृत डेटा-प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से कानूनन अधिकृत अधिकारियों को उनके अधिकारों के प्रयोग से रोका गया, जबकि अनधिकृत तत्वों को हस्तक्षेप की अनुमति मिली. पश्चिम बंगाल के अपीलीय न्यायाधिकरणों के 11 न्यायाधीशों और महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने भी इस तकनीकी व्यवस्था की कमियों को उजागर किया, जिसने अधिकारियों को उनके वैधानिक विवेक का इस्तेमाल करने से बाधित किया.

सितंबर 2026 में 'द इंडियन एक्सप्रेस' द्वारा किए गए खुलासे के बाद भी सबसे बड़ा सवाल अनुत्तरित है: वैध तरीके से शामिल किए गए 16 लाख से अधिक मतदाताओं के खिलाफ ये सामूहिक आपत्तियाँ आखिर किसने दर्ज कराईं?

सार यह है कि भारत का निर्वाचन आयोग अपनी साख के सबसे गंभीर संकट से गुजर रहा है. जब तक आयोग अपनी प्रक्रियात्मक पारदर्शिता बहाल नहीं करता, फॉर्मों के अनुचित बदलावों को वापस नहीं लेता और संस्थागत तटस्थता का परिचय नहीं देता, तब तक भारतीय लोकतंत्र की इस रीढ़ पर नागरिकों का विश्वास बहाल होना असंभव है.

(लेखक अशोक लवासा भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त और पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव हैं. यहां अंग्रेजी में उनके मूल लेख को हिंदी में अनूदित और संपादित कर पेश किया गया है.)

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