जिन मांगों का हवाला देकर चुनाव आयोग ने बदले थे सीसीटीवी फुटेज संबंधी नियम, नहीं दिया उनका रिकॉर्ड
‘द वायर’ में अंकित राज की यह विस्तृत रिपोर्ट भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा चुनावी पारदर्शिता और सीसीटीवी फुटेज तक सार्वजनिक पहुँच को सीमित करने के विवादास्पद फैसलों पर प्रकाश डालती है. अगस्त 2025 में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूची में अनियमित्ताओं के आरोपों के बाद, ईसीआई ने गोपनीयता का हवाला देकर सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करने की नीति का बचाव किया था.
निर्वाचन आयोग का कहना था कि कोई भी परेशान उम्मीदवार 45 दिनों के अंदर अपने चुनाव को चुनौती देने के लिए संबंधित हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटीशन फाइल कर सकता है. अगर यह याचिका फाइल की जाती है, तो सीसीटीवी फुटेज रख ली जाती है; नहीं तो, इसका कोई मकसद नहीं है- जब तक कि आपका इरादा कोई वोटर की निजता भंग करने का न हो.
इसके फौरन बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने भी निजता का हवाला दिया और सवाल किया था कि ‘क्या चुनाव आयोग को किसी भी मतदाता, चाहे वह उनकी मां हो, बहू हो, बेटी हो, के सीसीटीवी वीडियो साझा करने चाहिए?’
हालांकि, निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज और चुनावी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग को आम लोगों की पहुंच से बाहर करने का यह पहला प्रयास नहीं था. निजता का ज़िक्र करना ऐसा परदा था, जिसकी आड़ में आयोग चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठते सवालों के बाद छिप रहा था.
रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2024 में, ईसीआई ने बढ़ते अनुरोधों और प्रशासनिक बोझ का हवाला देते हुए चुनाव नियमों (नियम 93) में संशोधन कर सार्वजनिक दस्तावेजों की पहुँच को कड़ा कर दिया था. सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग से संबंधी नियमों में बदलाव करते हुए चुनाव आयोग ने दो प्रमुख तर्क दिए थे. पहला, ऐसी रिकॉर्डिंग हासिल करने के अनुरोध लगातार बढ़ रहे थे. दूसरा, उन्हें उपलब्ध कराने के लिये बड़े पैमाने पर प्रशासनिक संसाधन और कर्मचारियों की जरूरत पड़ती थी.
हालांकि, अब एक आरटीआई के जवाब में उसी चुनाव आयोग ने बताया है कि उसके पास इस बात के संबंध में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है कि आखिर पिछले पांच वर्षों में ऐसे कितने अनुरोध आए थे. यह जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ठीक दो साल पहले सीसीटीवी और चुनावी वीडियो रिकॉर्ड की सार्वजनिक पहुंच सीमित करने के लिए नियम बदलने का आधार खुद आयोग ने ऐसे अनुरोधों की कथित बढ़ती संख्या और उनसे पैदा होने वाले प्रशासनिक बोझ को बताया था.
यानी अब सवाल केवल यह नहीं है कि सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक होनी चाहिए या नहीं. सवाल यह भी है कि अगर फुटेज मांगने वालों की संख्या और उन अनुरोधों का पैमाना नियम बदलने के फैसले को सही ठहराने के लिए महत्वपूर्ण था, तो उस ‘बड़े पैमाने’ का आकलन आखिर किस रिकॉर्ड, आंकड़े या अध्ययन के आधार पर किया गया था? यह रिपोर्ट यह सवाल उठाती है कि बिना किसी ठोस डेटा या रिकॉर्ड के, केवल अनुमानों के आधार पर नियम क्यों बदले गए. इसके विपरीत, 2009 के आयोग के निर्देश खुद इस बात की पुष्टि करते हैं कि वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए आवेदन मिलना एक सामान्य प्रक्रिया थी.

