राजनीति का अपराधीकरण: भारत के लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा
‘काउंटरकरंट्स’ में वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव लिखते हैं कि भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों से जुड़े नेताओं में अक्सर जन प्रदर्शनों को लेकर डर और बेचैनी देखी जाती है. विरोध प्रदर्शन उनके लोकप्रिय समर्थन के दावों को चुनौती देते हैं. जब बड़ी संख्या में नागरिक सड़कों पर उतरते हैं, तो नेताओं के सहयोगियों, आर्थिक समर्थकों और राजनीतिक दलों के बीच भी उनकी राजनीतिक उपयोगिता को लेकर सवाल उठने लगते हैं. इससे उनके राजनीतिक नेटवर्क में दरार पड़ सकती है.
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द करने की मांग पर हो रहे प्रदर्शनों के बावजूद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने के आरोपों के मामले में ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने में न्यायपालिका की कथित निष्क्रियता ने आम लोगों, खासकर युवाओं को निराश किया है. इससे न्यायपालिका की भूमिका और उसकी स्वतंत्रता को लेकर संदेह बढ़ा है.
सत्ता को जन आंदोलनों से चुनौती मिलने पर राजनीतिक नेतृत्व कई तरीके अपनाता है. शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दंगा, आतंकवाद या देशद्रोह से जोड़ना, प्रदर्शनकारियों को विदेशी एजेंट या पैसे लेकर आंदोलन करने वाला बताना, आयोजकों और उनके परिवारों को परेशान करना तथा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना इनमें शामिल हैं. भारत में भी विरोध प्रदर्शनों को कमजोर करने के लिए ऐसे उपाय अपनाए जाने के आरोप लगे हैं.
10 और 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली-एनसीआर में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों और इंटरनेट प्रतिबंधों के कारण कर्फ्यू जैसी स्थिति पैदा होने का दावा किया गया. 50 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बीच लगभग सात हजार प्रदर्शनकारियों, छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया या राजधानी की सीमाओं पर रोक दिया गया. यह घटनाक्रम शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है.
न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए फॉर्म-6 पर कोई न्यायिक फैसला नहीं दिया गया था. अदालत के अनुसार, जब बिहार एसआईआर मामले की सुनवाई हुई थी, तब नया फॉर्म-6 सामने नहीं आया था. ज्ञानेश कुमार के इस संबंध में दिए गए कथित बयान पर अदालत की प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं. यह मांग भी की गई है कि न्यायपालिका इस मामले में स्पष्ट रुख अपनाए.
एसआईआर का फैसला ज्ञानेश कुमार द्वारा एकतरफा लिए जाने का आरोप भी लगाया गया है. इस मुद्दे पर सुधारात्मक कार्रवाई नहीं होने से चुनाव आयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर संदेह बढ़ने की बात कही गई है. सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को कहा कि एसआईआर से संबंधित नई याचिका की सुनवाई पहले से लंबित याचिकाओं के साथ 27 अक्टूबर को निर्धारित सुनवाई के दौरान की जाएगी.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा कांग्रेस नेताओं की ‘वोट चोरी’ के आरोप पर निजी मुलाकात की मांग स्वीकार नहीं किए जाने की भी आलोचना हुई है. न्यायपालिका राजनीतिक विवादों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकती, क्योंकि अदालतें राजनीतिक अधिकारों और संस्थागत विवादों पर फैसले करती हैं. नागरिकों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी न्यायिक रास्ता उपलब्ध होना जरूरी है.
राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि का सवाल
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुछ नेताओं पर अपने पद और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल पुलिस जांच को प्रभावित करने, गवाहों को डराने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसी स्थिति में सत्ता जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत सुरक्षा और लाभ का साधन बन सकती है, जिससे कानून के शासन और संस्थागत विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचता है.
इस संदर्भ में अमित शाह के गुजरात के गृह राज्य मंत्री रहते हुए सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति मुठभेड़ मामलों का उल्लेख किया गया है. केंद्रीय जांच ब्यूरो ने इन मामलों में शाह की भूमिका को लेकर आरोप लगाए थे. वर्ष 2010 में सोहराबुद्दीन मामले के संबंध में उन्हें दो साल के लिए गुजरात से बाहर रहने का आदेश दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दोनों मामलों को एक साथ जोड़ दिया और 2014 में शाह को दोनों मामलों से आरोपमुक्त कर दिया.
राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि और विचारधारा के संबंध पर भी सवाल उठाए गए हैं. सत्ता हासिल करना कुछ नेताओं के लिए व्यक्तिगत लाभ और संरक्षण का माध्यम बन सकता है. ऐसे नेता अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखने के लिए पहचान आधारित राजनीति और व्यक्तिगत हितों पर आधारित नेटवर्क का सहारा ले सकते हैं.
युवाओं के आंदोलन और लोकतांत्रिक संस्थाएं
बांग्लादेश और नेपाल में हुए युवा आंदोलनों का उल्लेख करते हुए आशंका जताई गई है कि भारत में भी युवाओं के प्रदर्शनों को विदेशी समर्थन वाली ‘कलर रिवॉल्यूशन’ जैसी गतिविधियों के नजरिए से देखा जा रहा है. भारी पुलिस बल की तैनाती और कठोर सुरक्षा उपायों को लेकर आलोचना हुई है. वहीं, अमित शाह ने कहा है कि आपातकाल लगाकर शासन करना कांग्रेस की संस्कृति है, मौजूदा सरकार की नहीं.
लोकतंत्र की मजबूती न्यायपालिका, पुलिस और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर जनता के भरोसे पर निर्भर करती है. राजनीति में अपराधीकरण, विरोध प्रदर्शनों पर कठोर कार्रवाई और संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर उठते सवाल इस भरोसे को प्रभावित कर सकते हैं. कानून का समान अनुपालन, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है.

