भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: हिंदी विरोधी आंदोलन से किसान आंदोलन तक

‘अल जज़ीरा’ यशराज शर्मा ने लिखा है कि भारत में चुनावी मतदाता सूची से जुड़े विवादों को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं के पास आंदोलनों की एक लंबी ऐतिहासिक विरासत है. हाल के दिनों में दिल्ली के मध्य हिस्सों में हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों को धरना देने के लिए जगह हासिल करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. छात्र संगठनों और विपक्षी दलों के आंदोलन के बीच सोमवार को बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे.

सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रविरोधी हितों से जुड़ा बताने की कोशिश की है. हालांकि, भारत का इतिहास बताता है कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक जन आंदोलनों ने देश की राजनीति और समाज को गहराई से प्रभावित किया है. राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार, सरकारें समय-समय पर आंदोलनों का विरोध करती रही हैं, लेकिन विरोध प्रदर्शन भारत की राजनीतिक यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं.

हिंदी विरोधी आंदोलन (1965)

संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को अंग्रेजी की जगह प्रमुख आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी. दक्षिण भारत, विशेषकर तत्कालीन मद्रास राज्य के तमिल भाषी लोगों को आशंका थी कि इससे सरकारी नौकरियों, सिविल सेवा परीक्षाओं और केंद्र सरकार में उनके अवसर प्रभावित होंगे.

द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि के नेतृत्व में आंदोलन किया. प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि हिंदी के साथ अंग्रेजी का इस्तेमाल भी जारी रहेगा. 1967 के विधानसभा चुनाव में डीएमके ने तमिलनाडु में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. अंग्रेजी भारत की दो आधिकारिक भाषाओं में बनी रही.

जेपी आंदोलन (1970 का दशक)

1973-74 में गुजरात और बिहार में भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकारी कुप्रबंधन के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुए. समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ देशव्यापी अभियान बन गया. उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया.

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई. आपातकाल समाप्त होने के बाद विपक्षी दल एकजुट हुए और 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हरा दिया. भारत में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.

मंडल आयोग विरोध और आर्थिक सुधारों के खिलाफ आंदोलन

1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की. इसके विरोध में कई छात्र सड़कों पर उतरे, जबकि आरक्षण समर्थकों ने जातिगत भेदभाव और अवसरों की असमानता दूर करने के लिए इसे जरूरी बताया. 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को बाहर रखते हुए ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा.

इसी दौर में 1991 के आर्थिक सुधारों, निजीकरण और विदेशी निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों के खिलाफ श्रमिक संगठनों ने प्रदर्शन और हड़तालें कीं. हालांकि, इन आंदोलनों के बावजूद आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम जारी रहा.

उदारीकरण और वैश्वीकरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (1990 के दशक की शुरुआत)

ये विरोध प्रदर्शन किसी एक संगठित अभियान का हिस्सा नहीं थे, बल्कि भारत के आर्थिक सुधारों के खिलाफ मजदूर आंदोलनों और हड़तालों की एक श्रृंखला के रूप में सामने आए. इन सुधारों की शुरुआत 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में हुई थी. मनमोहन सिंह आगे चलकर 2004 में प्रधानमंत्री बने.

आर्थिक सुधारों के तहत निजी कारोबार पर लगे प्रतिबंध कम किए गए और विदेशी निवेश के लिए अधिक क्षेत्रों को खोला गया. ट्रेड यूनियनों को आशंका थी कि निजीकरण और कारोबार बंद करने की आसान प्रक्रिया से नौकरियां खत्म होंगी, सामूहिक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी और श्रमिकों के अधिकारों को नुकसान पहुंचेगा.

वामपंथी राजनीतिक दलों ने इन विरोध प्रदर्शनों में से कई का समर्थन किया. हालांकि, आंदोलन आर्थिक सुधारों के कार्यक्रम को रोकने में सफल नहीं हो सके.

इसके बाद की सरकारों ने भी निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने, सरकारी उपक्रमों में विनिवेश करने और श्रम नियमों में बदलाव करने की प्रक्रिया जारी रखी.

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (2011)

कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर भूख हड़ताल और प्रदर्शन किए. अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण सहित कई कार्यकर्ता आंदोलन से जुड़े. दिसंबर 2013 में संसद ने लोकपाल कानून पारित किया. बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने.

निर्भया कांड के बाद प्रदर्शन (2012)

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म और गंभीर मारपीट हुई. 29 दिसंबर को उसकी मौत हो गई. देशभर में यौन हिंसा, महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन हुए. इसके बाद संसद ने 2013 में आपराधिक कानून संशोधन पारित किया, जिसमें कई यौन अपराधों की कानूनी परिभाषा और दंड संबंधी प्रावधानों में बदलाव किए गए.

नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन (2019-20)

दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई प्रवासियों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान किया, जबकि मुसलमानों को इसके दायरे से बाहर रखा गया. आलोचकों ने इसे धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत बताया. शाहीन बाग में महिलाओं के नेतृत्व वाला धरना आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बना. हालांकि, आंदोलन कानून को निरस्त नहीं करा सका, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई. सरकार ने मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए.

किसान आंदोलन (2020-21)

केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए. किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था कमजोर हो सकती है. संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक डटे रहे. नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की. यह आंदोलन सरकार से महत्वपूर्ण रियायत हासिल करने का बड़ा उदाहरण बना.

‘कॉकरोच’ आंदोलन (2026)

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहने वाली टिप्पणियों के बाद विवाद खड़ा हुआ. छात्र अभिजीत दिपके ने इसी व्यंग्य को आधार बनाकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) नाम का दबाव समूह बनाया. राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन में छात्र संगठनों ने भी भाग लिया. जुलाई 2026 में इन प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा. अब यही समूह विपक्षी दलों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है.

भारत के इन आंदोलनों का इतिहास दिखाता है कि जन प्रदर्शन कभी नीतियों में बदलाव लाते हैं, कभी सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोलते हैं और कभी तत्काल मांगें पूरी न होने के बावजूद राजनीतिक बहस को नई दिशा देते हैं.

Previous
Previous

चीन ने कहा कि वह लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश को मान्यता नहीं देता; 28 नामकरण पर भारत के साथ तीखी बहस

Next
Next

राजनीति का अपराधीकरण: भारत के लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा