दशकों तक राज्य के साथ खड़े रहे जम्मू-कश्मीर के आदिवासी अब बेदखली, तोड़फोड़ और अपने ही घर में असुरक्षा का सामना कर रहे हैं
जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लिए जम्मू के सिदरा बांधी इलाके में 28 घरों का गिराया जाना केवल जमीन विवाद नहीं है. समुदाय के नेताओं का कहना है कि यह घटना उनकी जमीन, चरागाहों और सदियों पुरानी खानाबदोश जीवन शैली पर बढ़ते संकट का हिस्सा है.
‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 मई 2026 को सिदरा में पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई के बाद 28 घरों को तोड़ दिया गया. स्थानीय लोगों का दावा है कि इनमें से कई मकान 35 साल से अधिक पुराने थे और वे निजी जमीन या सामुदायिक चरागाहों पर बने थे. वहीं वन विभाग का कहना है कि ये निर्माण वन भूमि पर अवैध कब्जे थे.
67 वर्षीय अशरफ अली कथाना ने बताया कि जब अधिकारी उनके घर पहुंचे, तब वह सुबह की नमाज पढ़ रहे थे. उनके अनुसार, उन्हें और उनकी पत्नी को धार्मिक प्रक्रिया पूरी करने का भी समय नहीं दिया गया.
"पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया. मेरी पत्नी भी नमाज पढ़ रही थीं और कुरान पढ़ रही थीं, लेकिन उन्हें भी उसे बंद करने का मौका नहीं दिया गया." कथाना ने कहा.
स्थानीय निवासियों के अनुसार, कुछ ही घंटों में 28 घर मलबे में बदल गए और करीब 1500 लोग अस्थायी तंबुओं में रहने को मजबूर हो गए.
एक डरावना नकारात्मक संदेश
सिदरा की कार्रवाई के बाद गुज्जर-बकरवाल समुदाय में यह सवाल उठ रहा है कि वन अधिकार कानून, 2006 के तहत उनके अधिकारों को क्यों नहीं माना जा रहा.
समुदाय का कहना है कि वे लंबे समय से जंगलों और चरागाहों पर निर्भर रहे हैं और वन अधिकार कानून उन्हें ऐसे इलाकों में रहने और आजीविका का अधिकार देता है.
गुज्जर-बकरवाल जम्मू-कश्मीर की बड़ी अनुसूचित जनजाति आबादी में शामिल हैं. करीब 20 लाख की आबादी वाला यह समुदाय क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी सामाजिक इकाइयों में गिना जाता है.
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि भारत के साथ लंबे समय तक खड़े रहे गुज्जर-बकरवाल समुदाय के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई एक गलत संदेश भेजती है.
तोड़फोड़ और भाजपा की भूमिका
सिदरा के निवासियों का कहना है कि वे अवैध कब्जाधारी नहीं हैं. उनका दावा है कि वे 1990 के बाद कश्मीर से विस्थापित होकर यहां बसे और उनके पास बिजली बिल, राशन कार्ड तथा जमीन से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं.
स्थानीय लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक विक्रम रंधावा पर कार्रवाई का माहौल बनाने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि मंदिर जाने के रास्ते को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद यह कार्रवाई हुई.
रंधावा ने आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि कार्रवाई केवल वन भूमि पर बने अवैध निर्माणों के खिलाफ हुई और इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है.
लगातार सीमित होता जा रहा जीवन
गुज्जर-बकरवाल समुदाय पीढ़ियों से पशुपालन और मौसमी प्रवास पर निर्भर रहा है. गर्मियों में वे जम्मू के मैदानी इलाकों से कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों की ओर जाते हैं और सर्दियों में वापस लौटते हैं.
लेकिन समुदाय के लोगों का कहना है कि अब उनके पारंपरिक रास्ते सिकुड़ रहे हैं. वन विभाग की बाड़, चरागाहों पर कब्जे और नए निर्माणों के कारण उनकी आवाजाही मुश्किल हो रही है.
सांबा के फैसल रजा बोडका ने कहा कि बकरवाल समुदाय जंगलों के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
"हमारे पशुओं से मिलने वाली खाद जंगलों की उर्वरता बढ़ाती है. इसके बावजूद हमें बिना पर्याप्त प्रक्रिया के बेदखल किया जा रहा है."
उन्होंने सामाजिक भेदभाव का भी आरोप लगाया और कहा कि समुदाय को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
घटते प्रवास मार्ग
गुज्जर-बकरवाल परिवार हर साल करीब 600 किलोमीटर की यात्रा करते हैं. लेकिन अब पुराने प्रवास मार्गों के बंद होने से उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं.
समुदाय के अनुसार, जंगलों में बढ़ते प्रतिबंध, चरागाहों का निजीकरण और सुरक्षा कारणों से रास्ते प्रभावित हुए हैं. कई परिवार अब पशुओं को ट्रकों में ले जाने या खतरनाक राजमार्गों से गुजरने को मजबूर हैं.
तालिब हुसैन ने कहा कि प्रवास के दौरान मौसम, सड़क दुर्घटनाओं और वन विभाग की पाबंदियों के कारण नुकसान बढ़ रहा है.
बेदखली और जमीन की असुरक्षा
गुज्जर-बकरवाल नेताओं का कहना है कि सिदरा की घटना पहली नहीं है.
2020 में पहलगाम के पास लिदरू इलाके में वन विभाग ने जमीन खाली कराई थी. 2021 में शोपियां जिले में बेदखली कार्रवाई के दौरान विरोध हुआ था. 2025 में गांदरबल में भी वन विभाग की कार्रवाई के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने प्रदर्शन किया था.
समुदाय के नेताओं के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या सुरक्षित जमीन की कमी है.
गुज्जर-बकरवाल स्टूडेंट्स अलायंस के प्रवक्ता अमीर चौधरी ने कहा, "जहां भी हम बसते हैं, वहां हमें बेदखली का खतरा बना रहता है."
वन अधिकार का अधूरा वादा
समुदाय के कई नेता इन विवादों की वजह वन अधिकार कानून, 2006 के अधूरे क्रियान्वयन को मानते हैं.
आदिवासी शोधकर्ता जावेद राही का कहना है कि गुज्जर-बकरवाल परिवारों को केवल अतिक्रमणकारी मानना सही नहीं है, क्योंकि वे जंगलों पर निर्भर आदिवासी समुदाय हैं.
उनके अनुसार, किसी भी बेदखली से पहले समुदाय के अधिकारों का निर्धारण जरूरी है.
कम गिनती, ज्यादा नुकसान
गुज्जर-बकरवाल समुदाय को यह चिंता भी है कि उनकी वास्तविक आबादी जनगणना में दर्ज नहीं हो पाएगी, क्योंकि कई परिवार उस समय ऊंचे इलाकों में पशुओं के साथ प्रवास पर होते हैं.
समुदाय के नेताओं का कहना है कि गलत आंकड़े सरकारी योजनाओं और संसाधनों के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं.
शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. समुदाय का कहना है कि खानाबदोश जीवन शैली के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और मोबाइल स्कूल जैसी योजनाएं जमीन पर प्रभावी नहीं हैं.
2024 में पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद गुज्जर-बकरवाल संगठनों ने आरक्षण और सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी को लेकर चिंता जताई है.
जम्मू-कश्मीर के गुज्जर-बकरवाल समुदाय का संघर्ष अब केवल कुछ घरों के टूटने तक सीमित नहीं है. यह उनके पारंपरिक जीवन, जमीन के अधिकार और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है.

