‘तुम्हें मारते हैं और शिकायत भी नहीं करने देते’: केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ लड़ाई पर गांधीवादी कार्यकर्ता अमित भटनागर

‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित रिजवान रहमान की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों के उन 21 गांवों की लड़ाई को सामने लाया गया है, जो केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के कारण विस्थापन के खतरे का सामना कर रहे हैं. इस बातचीत में गांधीवादी कार्यकर्ता और आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल अमित भटनागर ने गिरफ्तारियों, मकान गिराए जाने, पुलिस कार्रवाई और मुआवजे से आगे जल, जंगल और जमीन बचाने की लड़ाई पर विस्तार से बात की है.

केन-बेतवा परियोजना को भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है. वर्ष 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूर इस परियोजना के तहत सरकार के अनुसार केन नदी के अतिरिक्त पानी को 221 किलोमीटर लंबी नहर और दो सुरंगों के जरिए बेतवा नदी तक पहुंचाया जाना है. इसके लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर 77 मीटर ऊंचा दौधन बांध बनाया जा रहा है.

परियोजना की लागत करीब 44 हजार करोड़ रुपये बताई गई है. इसका असर मध्य प्रदेश के 20 से अधिक गांवों पर पड़ेगा और पन्ना टाइगर रिजर्व में 40 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की आशंका है. पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों का कहना है कि केन नदी में पानी की उपलब्धता को लेकर सरकार के दावे पुराने आंकड़ों पर आधारित हैं और परियोजना से पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों पर गंभीर असर पड़ेगा.

अमित भटनागर के अनुसार, आंदोलन की सबसे बड़ी वजह उचित मुआवजा और पुनर्वास का अभाव है. उनका आरोप है कि ग्रामीण सदियों से इन इलाकों में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें कानून के मुताबिक पुनर्वास दिए बिना हटाया जा रहा है. उनका यह भी दावा है कि ग्राम सभा के दस्तावेजों में गड़बड़ी है और वास्तविक ग्राम सभाएं आयोजित नहीं की गईं.

भटनागर कहते हैं कि ग्रामीणों के लिए केन नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं बल्कि जीवन का आधार है. उनके अनुसार, परियोजना से केवल घर और जमीन नहीं जाएंगे, बल्कि लोगों का पूरा सामाजिक और आर्थिक जीवन उजड़ जाएगा. उनका सवाल है कि जिस बुंदेलखंड में पहले से पानी की समस्या है, वहां नदी के प्रवाह में बड़े बदलाव से स्थिति कैसे बेहतर होगी.

आंदोलन की शुरुआत गांव-गांव जाकर लोगों को परियोजना और कानून की जानकारी देने से हुई. भटनागर के मुताबिक शुरुआती दौर में केवल दो-तीन गांव साथ आए, लेकिन धीरे-धीरे सभी प्रभावित 21 गांव आंदोलन से जुड़ गए. ग्रामीणों ने पदयात्राएं, तिरंगा यात्राएं, जल सत्याग्रह, उपवास और प्रतीकात्मक चिता आंदोलन जैसे अहिंसक तरीके अपनाए.

इस संघर्ष में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनकर सामने आई. भटनागर बताते हैं कि जब आंदोलन से जुड़े पुरुषों के नाम मुआवजे की पात्रता सूची से हटाए जाने लगे और उन्हें धमकाया गया, तब महिलाओं ने आगे आकर आंदोलन की कमान संभाली. फरवरी 2026 में महिलाओं ने "न्याय नहीं तो बांध नहीं" के नारे के साथ प्रदर्शन शुरू किया.

8 फरवरी को भटनागर की गिरफ्तारी के बाद दो से तीन हजार महिलाओं ने बिजावर के अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय को घेर लिया. प्रशासन द्वारा पानी की बौछार किए जाने के बावजूद महिलाएं पीछे नहीं हटीं. भटनागर के अनुसार, उनकी गिरफ्तारी आंदोलन के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुई और अलग-अलग गांवों की महिलाएं पहली बार बड़े पैमाने पर एकजुट हुईं.

अप्रैल 2026 में आंदोलनकारियों ने दौधन बांध के पास प्रतीकात्मक चिता आंदोलन किया. इसके बाद पंचतत्व सत्याग्रह शुरू किया गया, जिसमें मिट्टी, अग्नि, आकाश, वायु और जल को आंदोलन के प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल किया गया. भटनागर इसे प्रकृति और विस्थापन के बीच संबंध को सामने रखने का तरीका बताते हैं.

मई में उनकी दोबारा गिरफ्तारी हुई. उनके अनुसार, एक मामले में जमानत मिलने के तुरंत बाद वन विभाग ने उन्हें दूसरे मामले में गिरफ्तार कर लिया. बाद में आंदोलनकारियों पर कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए. भटनागर का दावा है कि उनके खिलाफ अकेले आठ मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि आंदोलन से जुड़े करीब 300 लोगों पर मुकदमे लगाए गए हैं.

3 जुलाई से बराना नदी के किनारे आंदोलन शुरू हुआ और 6 जुलाई को भटनागर ने अनशन शुरू किया. उनका आरोप है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के लिए पानी और दवाओं तक पहुंच रोकने की कोशिश की. 19 जुलाई को पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली कराया और भटनागर को वहां से हटा दिया. उनके अनुसार, कार्रवाई के दौरान कई लोग घायल हुए और कई आदिवासी महिलाओं पर लाठीचार्ज हुआ.

भटनागर के मुताबिक, विस्थापित परिवारों को अभी 12.5 लाख रुपये तक का मुआवजा देने की बात कही जा रही है, लेकिन यह राशि केवल एक घर बनाने के लिए पर्याप्त है. ग्रामीण तीन एकड़ जमीन की मांग कर रहे हैं ताकि विस्थापन के बाद उनकी आजीविका बची रहे. उनकी मांग है कि नए स्थान पर एक पूरा गांव बसाया जाए और जमीन महिला तथा पुरुष दोनों के संयुक्त नाम पर दी जाए.

उनका कहना है कि असली सवाल केवल मुआवजे का नहीं है. विस्थापन के साथ लोगों का पानी, जंगल, जमीन, रोजगार, सामाजिक संबंध और पारंपरिक जीवन खत्म हो जाएगा. इसलिए वे "एक गांव के बदले एक गांव" की मांग कर रहे हैं.

अमित भटनागर अपने आंदोलन को गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से प्रभावित बताते हैं. उनका कहना है कि लोकतंत्र में संघर्ष का रास्ता लोकतांत्रिक और अहिंसक होना चाहिए. उनके अनुसार, आम लोगों का दर्द ही उन्हें लगातार लड़ने की ताकत देता है.

दिल्ली और दूसरे शहरों में युवाओं के आंदोलनों से समानता के सवाल पर भटनागर कहते हैं कि वहां भी लड़ाई न्याय के लिए थी और यहां भी संघर्ष न्याय के लिए है. उनका मानना है कि युवा लाठीचार्ज और दमन के बावजूद पीछे नहीं हटे और गांवों में भी लोग उसी तरह आगे आ रहे हैं. उनके शब्दों में, "हमारी जेन जी ने तानाशाहों को झुकाया है. हमने अपनी बात कहना और लगातार संघर्ष करना सीखा है."

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