अरुण श्रीवास्तव | मोदी से दूरी बनाने लगा भारतीय मध्य वर्ग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विमर्श में मध्य वर्ग और नव-मध्य वर्ग को भारत की आर्थिक विकास यात्रा का महत्वपूर्ण आधार बताया जाता रहा है. लेकिन अरुण श्रीवास्तव का विश्लेषण है कि पिछले एक दशक में आर्थिक दबाव, रोजगार संकट, बढ़ती महंगाई, घरेलू कर्ज और असमानता ने इसी वर्ग के भीतर असंतोष को बढ़ाया है. 2014 में मोदी के साथ मजबूती से खड़ा दिखाई देने वाला शहरी और शिक्षित मध्य वर्ग अब अपनी आर्थिक आकांक्षाओं और वास्तविक परिस्थितियों के बीच बढ़ते अंतर को महसूस कर रहा है.

मोदी सरकार के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास मॉडल तीन प्रमुख प्रवृत्तियों से प्रभावित हुआ है—हिंदुत्व आधारित राजनीतिक विमर्श, सत्ता का बढ़ता केंद्रीकरण और उदारीकरण के साथ पूंजी तथा श्रम संबंधों में बदलाव. सरकार करोड़ों लोगों के गरीबी से निकलकर नव-मध्य वर्ग में आने की बात करती है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा समाज के शीर्ष तबके में संपत्ति के बढ़ते संकेंद्रण के साथ आया है. वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब सहित विभिन्न अध्ययनों ने भारत में संपत्ति और आय के शीर्ष स्तर पर बढ़ती एकाग्रता की ओर संकेत किया है.

मध्य वर्ग के भीतर असंतोष का सबसे बड़ा कारण रोजगार और आय की असुरक्षा है. शिक्षा के माध्यम से बेहतर जीवन हासिल करने की पारंपरिक उम्मीद कमजोर हुई है. बड़ी संख्या में शिक्षित युवा स्थायी और सम्मानजनक नौकरियों के बजाय अस्थायी, संविदा या गिग वर्क की ओर जा रहे हैं. आज का युवा डिग्री हासिल करने के बाद भी यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा कि उसे स्थिर रोजगार और सामाजिक गतिशीलता का अवसर मिलेगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन ने भी मध्य स्तर की कई नौकरियों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है.

आज मध्य वर्ग एक तरह के 'ट्रिपल स्क्वीज' का सामना कर रहा है. एक ओर वास्तविक आय और वेतन वृद्धि सीमित है, दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजमर्रा की जरूरतों की लागत लगातार बढ़ रही है. तीसरी ओर घरेलू कर्ज और ईएमआई का बोझ बढ़ रहा है. जिन परिवारों ने कभी बचत और संपत्ति निर्माण को आर्थिक सुरक्षा का आधार माना था, उन्हें अब अपनी जीवनशैली बनाए रखने के लिए बचत खर्च करनी पड़ रही है या कर्ज लेना पड़ रहा है.

कर(टैक्स) व्यवस्था भी मध्य वर्ग की नाराजगी का महत्वपूर्ण कारण बन रही है. वेतनभोगी वर्ग प्रत्यक्ष आयकर के साथ रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी का भुगतान करता है. दूसरी ओर, उसे लगता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरी बुनियादी सुविधाओं के लिए उसे निजी क्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ रहा है. निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और अस्पतालों की बढ़ती लागत ने परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाला है. पूंजीगत लाभ कर और निवेश से जुड़े नियमों में बदलाव ने छोटे निवेशकों की चिंता भी बढ़ाई है.

मध्य वर्ग की परेशानी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी होती जा रही है. 2014 में इस वर्ग के एक हिस्से ने मोदी को विकास, रोजगार और बेहतर प्रशासन की उम्मीद के साथ समर्थन दिया था. लेकिन समय के साथ विकास के नैरेटिव की जगह पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति के बढ़ने से पेशेवर और शिक्षित वर्ग के एक हिस्से में थकान दिखाई देने लगी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों में आई गिरावट को इसी बदलते राजनीतिक रुझान के एक संकेत के रूप में देखा गया.

'दिमागी नक्सल' जैसे राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल भी मध्य वर्ग के संदर्भ में महत्वपूर्ण है. 1970 के दशक में छात्रों, शिक्षकों, वकीलों, बुद्धिजीवियों और दूसरे पेशेवर समूहों ने वामपंथी और जन आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आज भी शिक्षित युवा और मध्य वर्ग बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था की विफलता, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक समस्याओं के खिलाफ आंदोलनों में दिखाई देता है. नीट जैसी परीक्षाओं, पेपर लीक और रोजगार के सवालों पर हुए विरोध प्रदर्शनों में इसका प्रभाव देखा गया है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता भी मध्य वर्ग के लिए चिंता का विषय है. उच्च वेतन वाली आईटी और सेवा क्षेत्र की नौकरियां वैश्विक व्यापार, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी हैं. ऐसे में वैश्वीकरण में गिरावट और संरक्षणवादी नीतियां इस वर्ग की भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकती हैं. सरकार आत्मनिर्भर भारत और घरेलू विनिर्माण पर जोर देती है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों की कठिनाइयां तथा रोजगार सृजन की धीमी गति इस नीति के प्रभाव पर सवाल खड़े करती है.

यही कारण है कि भारतीय मध्य वर्ग का एक हिस्सा अब केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अपनी आर्थिक स्थिति को भी चुनावी फैसलों से जोड़ रहा है. बढ़ती असमानता, महंगाई, रोजगार की कमी, करों का बोझ और भविष्य की अनिश्चितता ने उस वर्ग के भीतर अलगाव की भावना पैदा की है, जो कभी मोदी सरकार का सबसे भरोसेमंद सामाजिक आधार माना जाता था.

मोदी के लिए चुनौती यही है कि मध्य वर्ग की आकांक्षाएं केवल सांस्कृतिक या राजनीतिक मुद्दों से पूरी नहीं होंगी. उसे स्थिर रोजगार, बेहतर सार्वजनिक सेवाएं, सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य, किफायती आवास, वास्तविक आय में वृद्धि और आर्थिक सुरक्षा चाहिए. यदि विकास का लाभ समाज के शीर्ष हिस्से तक सीमित दिखाई देता रहा और मध्य वर्ग की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई, तो यह वर्ग राजनीतिक रूप से भी अपनी प्राथमिकताएं बदल सकता है. भारत की राजनीति में मध्य वर्ग का यह संभावित बदलाव आने वाले वर्षों में मोदी और भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक हो सकता है.

यह काउंटरकरंट्स में अरुण श्रीवास्तव द्वारा प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनूदित अंश है. 

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