बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल होने पर कर सकता है विचार, विदेश संबंधों की परीक्षा
‘रॉयटर्स’ में रूमा पॉल की रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश दक्षिण एशिया में अपनी कूटनीतिक और सैन्य प्राथमिकताओं को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है. हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि भारत का पड़ोसी यह मुल्क एक तरफ मध्य पूर्व के नए सैन्य सुरक्षा ढांचों की ओर आकर्षित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीन से भारी रक्षा खरीद के जरिए अपनी सैन्य शक्ति को आधुनिक बनाने में जुटा है. इन कदमों से बांग्लादेश के भारत सहित वैश्विक शक्तियों के साथ संबंधों में नए समीकरण बनने की संभावना है.
'मक्का समझौते' की ओर बढ़ता रुझान
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने संकेत दिया है कि उनका देश सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए नए पारस्परिक रक्षा समझौते—'मक्का समझौते'—में शामिल होने पर सकारात्मक रूप से विचार कर सकता है. नाटो के 'सामूहिक-रक्षा सिद्धांत' की तर्ज पर गठित इस समझौते का मुख्य नियम यह है कि किसी एक सदस्य देश पर हुआ सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरानी मिसाइल हमलों की पृष्ठभूमि में बने इस गुट ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को शामिल होने का निमंत्रण दिया है. यद्यपि बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, फिर भी 90% से अधिक सुन्नी मुस्लिम आबादी होने के कारण इसे इस्लामिक देशों के इस सुरक्षा नेटवर्क से जुड़ने में राजनीतिक सहजता दिखाई दे रही है.
भारत के साथ तनाव और कूटनीतिक जटिलताएँ
मक्का समझौते में शामिल होने की संभावना ऐसे समय में उभरी है जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते पहले से ही संवेदनशील मोड़ पर हैं. अगस्त 2024 के विरोध आंदोलन के बाद पदच्युत हुईं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में निर्वासित जीवन बिता रही हैं. बांग्लादेश की नई सरकार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रही है, जिस पर नई दिल्ली की प्रतिक्रिया का इंतजार है. इसके अलावा, भारतीय सीमा सुरक्षा बलों पर लोगों को बांग्लादेश की ओर धकेलने के आरोपों ने भी तनाव बढ़ाया है.
विश्लेषकों का मानना है कि यदि बांग्लादेश इस रक्षा गुट का हिस्सा बनता है, तो भारत के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होगा, क्योंकि इसमें उसका पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान भी शामिल है. भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर करीब से नज़र रख रहा है.
जानकार कहते हैं कि बांग्लादेश की ऐतिहासिक विदेश नीति किसी भी सैन्य ब्लॉक से दूर रहकर 'गुटनिरपेक्षता' बनाए रखने की रही है, जिससे उसे हर वैश्विक शक्ति से निवेश और व्यापार में मदद मिलती रही है. विशेषज्ञों के अनुसार, किसी सैन्य गठबंधन से जुड़ने पर बांग्लादेश को निम्नलिखित जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है:
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तैयार कपड़ों के निर्यात (जो मुख्य रूप से अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जाते हैं) और मध्य पूर्व से आने वाले रेमिटेंस पर टिकी है. किसी विशिष्ट गुट में शामिल होने से पश्चिमी और क्षेत्रीय साझेदारों के साथ वाणिज्यिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं.
विश्लेषक कल्लोल किबरिया और प्रो. आसिफ शाहन के अनुसार, सैन्य ब्लॉक में शामिल होने से भारत, चीन, अमेरिका, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संबंधों में बांग्लादेश का तटस्थ रहना मुश्किल हो जाएगा.
चीन के साथ बड़ा रक्षा सौदा: एक अन्य प्रमुख घटनाक्रम में, बांग्लादेश चीन के साथ लगभग 24 J-10CE लड़ाकू विमानों और हमलावर हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए आधिकारिक वार्ता शुरू करने के करीब है. यह समझौता बांग्लादेश की अब तक की सबसे बड़ी रक्षा खरीदों में से एक होगा. चीन पहले से ही ढाका का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता (टैंक, नौसैनिक पोत और मिसाइल प्रणाली) रहा है. इस सौदे से दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध और अधिक गहरे होंगे.
पॉल की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की ये पहल उसकी रक्षा और विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देती हैं, जो उसे वैश्विक कूटनीति के एक नए और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर खड़ा करती हैं.

