महबूबा मुफ़्ती | जेल में इमरान नहीं, पाकिस्तान की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था कैद है

जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती का ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित यह लेख पाकिस्तान की वर्तमान राजनीतिक स्थिति, लोकतंत्र के क्षरण और वहाँ की सेना (एस्टैब्लिशमेंट) के हस्तक्षेप का एक गहरा और विश्लेषणात्मक अवलोकन प्रस्तुत करता है. लेख का मुख्य बिंदु यह है कि पाकिस्तान की असली समस्या कोई एक नेता या राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वह संपूर्ण तंत्र है जो पीढ़ियों से एक ही दुष्चक्र में फंसा हुआ है.

महबूबा मुफ़्ती लिखती हैं कि पाकिस्तान को अपनी कप्तानी में क्रिकेट विश्व कप दिलाने वाले इमरान खान आज अदियाला जेल की सलाखों के पीछे हैं. हाल ही में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 से बंद इमरान खान को इलाज के लिए शिफा अस्पताल भेजने का स्पष्ट आदेश दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें केवल एक अन्य चिकित्सा संस्थान में जांच के बाद पुनः जेल भेज दिया गया. यह घटनाक्रम इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पाकिस्तान में कार्यपालिका और सैन्य तंत्र की प्राथमिकताओं के सामने देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश भी असहाय साबित हो रहे हैं. जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आदेश निष्प्रभावी हो जाएं, तो लोकतंत्र संकट में पड़ जाता है.

राजनीतिक बदले की परंपरा और राजनेताओं की भूल

लेख में ध्यान दिलाया गया है कि पाकिस्तान के नेता अक्सर सैन्य तंत्र की सहमति या मदद से सत्ता के शिखर तक पहुँचते हैं. सत्ता में आने के बाद वे सरकारी मशीनरी और संस्थानों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए करते हैं. लेकिन जल्द ही, वही सैन्य तंत्र वापस उनके खिलाफ खड़ा हो जाता है.

इमरान खान का दौर: 2018 में इमरान खान जब सैन्य समर्थन के दम पर सत्ता में आए, तब उनकी सरकार ने भी उसी दमनकारी संस्कृति को अपनाया. नवाज शरीफ और मरियम नवाज जैसे विरोधियों को जेल में डाला गया. जब इमरान खान का सेना के साथ 'एक ही रुख' टूट गया, तो अप्रैल 2022 में उन्हें पद से हटा दिया गया और अंततः जेल भेज दिया गया. राजनेता जब तक खुद बैरकों के हस्तक्षेप का सहारा लेकर चुनाव जीतने की आदत नहीं छोड़ेंगे, तब तक यह चक्र जारी रहेगा.

भारत और पाकिस्तान की ऐतिहासिक राहें

महबूबा के अनुसार, 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना के निधन के बाद पाकिस्तान नागरिक सरकार और सैन्य शक्ति के बीच संतुलन बनाने में विफल रहा. 1958 में जनरल अयूब खान के पहले तख्तापलट के बाद याह्या खान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ ने बारी-बारी से लोकतंत्र को कुचला. जनरल ज़िया के दौर में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी देना पाकिस्तान के इतिहास का सबसे काला पन्ना बना, जिसने देश को धार्मिक उग्रवाद और अस्थिरता की ओर धकेल दिया.

विभाजन का दर्द, कश्मीर विवाद और भारत के साथ युद्धों ने पाकिस्तान में सेना को केवल सीमा रक्षक ही नहीं, बल्कि देश का भाग्य विधाता और सर्वोच्च अभिभावक बना दिया.

इसके विपरीत, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे संस्थापकों के कारण भारत में सेना हमेशा निर्वाचित नागरिक सरकार के अधीन रही. यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र युद्धों, आपातकाल और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद अटूट रहा.

वैश्विक भूमिका और विरोधाभास

पाकिस्तान एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश है और मुस्लिम दुनिया में अपनी रक्षा क्षमता व कूटनीति के लिए जाना जाता है. मक्का समझौता और इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन जैसे घटनाक्रम उसे क्षेत्रीय शांति में भूमिका निभाने का अवसर देते हैं. लेकिन महबूबा मुफ़्ती का तर्क है कि जो देश अपने घर में ही राजनीतिक बदले और अस्थिरता में उलझा हो, वह वैश्विक मंच पर शांति और संविधानवाद का सच्चा समर्थक नहीं बन सकता.

पाकिस्तान के नागरिक एक बेहतर लोकतंत्र के हकदार हैं, जहाँ राजनीतिक दल बैरकों से मदद मांगना बंद करें. स्थायी सुधार के लिए ये कदम आवश्यक हैं: सेना को हमेशा के लिए अपनी संवैधानिक सीमाओं और बैरकों में वापस लौटना होगा, न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्रता के साथ काम करने देना होगा, चुनावों में जनता के वास्तविक जनादेश का सम्मान होना चाहिए और अदालतों व जेलों को राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से बदला लेने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए.

निष्कर्ष यह है जेल में केवल इमरान खान बंद नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था कैद है. पाकिस्तान के लोगों ने अपनी सेना को देश की रक्षा के लिए अपार सम्मान और संसाधन दिए हैं. सेना का काम राज्य की रक्षा करना है, न कि यह तय करना कि देश पर शासन कौन करेगा. इमरान खान की रिहाई और उसके बाद एक पारदर्शी, निष्पक्ष राजनीतिक प्रक्रिया इस गतिरोध को तोड़ सकती है. क्रिकेट की भाषा में कहें तो, कभी-कभी पवेलियन लौटना पारी का अंत नहीं, बल्कि खेल के नियम बदलने का नया दौर होता है.

(यह महबूबा मुफ़्ती के लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है)

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