‘पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का देश के सबसे बड़े निजी बैंक का प्रमुख बनना बहस का विषय होना चाहिए’

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा है कि चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर जारी विवाद केवल किसी एक मीडिया रिपोर्ट का नतीजा नहीं है. यह कहते हुए कि चुनावी संस्था के कामकाज पर लगभग एक दशक से सवाल उठ रहे हैं, प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर देशव्यापी चर्चा और चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग की.

‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, रविवार रात मीडिया से बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका होनी चाहिए.

प्रशांत किशोर ने कहा, "चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा केवल 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हुई है. इस बात पर देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए कि कैसे एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार आज देश के सबसे बड़े निजी बैंक के अध्यक्ष बन गए हैं."

भारत के एचडीएफसी बैंक ने अपने पूर्व अध्यक्ष के मार्च में अचानक इस्तीफा देने के बाद, जून में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को अपना अंशकालिक (पार्ट-टाइम) अध्यक्ष नियुक्त किया था. कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में 2024 के लोकसभा चुनावों की देखरेख की थी.

उन्होंने आगे कहा, "पिछले कई वर्षों में चुनाव आयोग के कामकाज के तरीके, विशेष रूप से चुनाव के दौरान और अन्य समय में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के तरीके के कारण उसकी विश्वसनीयता धूमिल हुई है. यह बहस पिछले 10 वर्षों से चल रही है."

प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी भाजपा चुनावी प्रक्रिया के कई पहलुओं पर अपना प्रभाव डालती दिखती है. उन्होंने कहा, "सत्ताधारी दल भाजपा, चुनाव की तारीखें तय करने से लेकर चुनाव कितने चरणों में कराए जाएं, हर चीज पर प्रभाव डालती नजर आती है. पूरी चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए व्यापक कदम उठाए जाने चाहिए."

प्रशांत किशोर ने आगे कहा, "सुप्रीम कोर्ट को इसमें भूमिका निभानी चाहिए. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया या चुनाव के व्यापक संचालन में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं होती है. विपक्षी दल केवल वहीं चुनाव जीत पाते हैं जहाँ भाजपा के खिलाफ भारी जनभावना की लहर होती है."

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