एक व्यक्ति (ज्ञानेश कुमार) का विचार बाकी दो लोगों (आयुक्तों) पर कैसे हावी हुआ: पूर्व चुनाव आयुक्त
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ से बातचीत में कहा कि भारत निर्वाचन आयोग को अपने कामकाज, विशेष रूप से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठाए गए सवालों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए.
लवासा ने कहा, "उन्हें पूरे तथ्यों के साथ खुले तौर पर सामने आना चाहिए. एसआईआर के तीसरे चरण को रद्द कर देना चाहिए क्योंकि इसमें कई कमियां हैं और यह अनावश्यक है. तीसरा चरण अभी पूरा नहीं हुआ है. आयोग को एसआईआर से पहले वाली मतदाता सूचियों पर वापस लौट जाना चाहिए."
जब से ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने यह रिपोर्ट प्रकाशित की है कि चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने एसआईआर के दौरान चुनावी संस्था द्वारा लिए गए निर्णयों पर बार-बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं, तब से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग लगातार तेज होती जा रही है.
अर्णव गांगुली के अनुसार, चुनाव आयोग ने अब तक चुनिंदा लीक (जानकारी साझा करने) और बयानों के जरिए अपारदर्शी नौकरशाही शब्दावली के पर्दे के पीछे रहना ही पसंद किया है. शनिवार को मुख्य चुनाव आयुक्त की संधू और जोशी के साथ एक तस्वीर मीडिया में जारी की गई, साथ ही मतदाताओं को आश्वस्त करने के लिए कुछ उपायों की घोषणाएं भी की गईं. विपक्षी दलों का मानना है कि यह काफी नहीं है, और लवासा की भी यही राय है.
पूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा, "चुनाव आयोग द्वारा लागू किए गए महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर विचारों में भिन्नता का संकेत मिलता है. हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि असहमति थी या नहीं. असहमति दर्ज होने के लिए एक एजेंडा होना जरूरी है."
उन्होंने आगे कहा, "इन पत्रों का क्या हुआ? क्या इनकी जांच की गई? इनका निपटारा कैसे किया गया? अंतिम निर्णय क्या लिए गए? चुनाव आयोग को पूरे तथ्यों के साथ सामने आना चाहिए. यदि कुछ भी गैर-कानूनी हुआ है, तो जवाबदेही तय की जानी चाहिए और आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए."
लवासा ने कहा, "यदि दो लोगों की एक जैसी राय थी और मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसके विपरीत काम किया, तो वे (सीईसी) ही असहमति जताने वाले हैं. यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि एक व्यक्ति का विचार बाकी दो लोगों पर कैसे हावी हुआ."
बंगाल का रहस्य
पूर्व चुनाव आयुक्त ने इस गर्मी में राज्य में चुनाव होने से पहले बंगाल में 16 लाख मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दर्ज अपीलों की ओर इशारा करते हुए इसे उन "रहस्यों" में से एक बताया जिसे चुनाव आयोग को सुलझाने की जरूरत है.
लवासा ने कहा, "किसी भी राज्य में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ — किसी एक राज्य में मतदाता सूची में 16 लाख नामों को शामिल किए जाने के खिलाफ अपीलें दर्ज होना. ये अनुरोध किसने किए? यह एक ऐसा रहस्य है जिसकी व्याख्या चुनाव आयोग को करनी चाहिए."
16 सितंबर को ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा नेता डेरेक ओ'ब्रायन को दिए अपने जवाब में, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि एसआईआर में बंगाल में दायर 38,31,249 अपीलों में से लगभग 22 लाख उन मतदाताओं की थीं जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए या बाहर रखे गए थे, जबकि 16 लाख से थोड़ा अधिक अपीलें नाम शामिल किए जाने के खिलाफ थीं.
चुनाव आयोग ने यह खुलासा नहीं किया है कि नाम शामिल किए जाने के खिलाफ ये अपीलें किसने दर्ज कराई थीं.
बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया सबसे विवादित रही है, क्योंकि वहाँ "तार्किक विसंगति" वाले मतदाताओं की एक श्रेणी बनाई गई थी, जिसके तहत चिन्हित 60 लाख मतदाताओं में से लगभग 27 लाख के नाम हटा दिए गए थे.
लवासा ने कहा, "आयोग खुद से नियमों में बदलाव नहीं कर सकता. वे संबंधित अधिकारियों, इस मामले में सरकार, की अनुमति के बिना नियमों को नहीं बदल सकते थे. अनुच्छेद 326 (जो मतदान के अधिकार से संबंधित है) के तहत एक बार जब कोई मतदाता पात्र पाया जाता है, तो उसके माता-पिता या दादा-दादी मतदाता थे या नहीं, इसका उसके मतदान के अधिकार से कोई लेना-देना नहीं है."
चुनाव आयोग ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 को बरकरार रखा है. हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि शीर्ष अदालत ने बिहार एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 से जुड़े घोषणापत्र को बरकरार रखा था, लेकिन उसने ऑनलाइन फॉर्म 6 में जुलाई में किए गए उस बदलाव पर कोई फैसला नहीं सुनाया, जो पिछले एसआईआर से माता-पिता का विवरण दर्ज करना अनिवार्य बनाता है.
लवासा ने कहा कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ही किसी मतदाता की पात्रता तय करने वाले एकमात्र प्राधिकरण हैं. उन्होंने जोर देकर कहा, "कोई दूसरा नहीं है. अपीलीय प्राधिकार जिला निर्वाचन अधिकारी या (राज्य के) मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास होता है. चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची तैयार करने पर केवल पर्यवेक्षी (सुपरवाइज़री) क्षेत्राधिकार है, लेकिन वह किसी मतदाता की पात्रता का निर्धारण नहीं कर सकता." इस मामले में गोवा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा था.

