रूस पर नए अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक ने मोदी को असमंजस में डाला, निकलने का रास्ता आसान नहीं
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय ऊर्जा नीति और विदेश नीति के एक ऐसे जटिल दोराहे पर खड़े हैं, जहाँ से निकलने का कोई आसान मार्ग दिखाई नहीं देता. एक तरफ, यदि भारत संभावित नए अमेरिकी शुल्कों (टैरिफ) से बचने के लिए रूसी तेल के आयात में कटौती करता है, तो देश में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं या सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय दबाव पड़ सकता है. आगामी उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों से ठीक पहले ईंधन के दाम बढ़ना सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ा राजनीतिक जोखिम है. दूसरी तरफ, यदि भारत रूसी तेल की खरीद जारी रखता है, तो अमेरिका में भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लग सकता है, जिससे भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है.
‘रॉयटर्स’ की यह रिपोर्ट कहती है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऊर्जा नीति के ऐसे असमंजस में फंस गए हैं जहाँ से निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक और रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदार भारत ने हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस में पेश उस विधेयक पर असामान्य रूप से कड़ा रुख अपनाया है, जो वॉशिंगटन को रूस से तेल खरीदने वाले देशों (जैसे भारत और चीन) पर 100% तक द्वितीयक शुल्क (सेकेंडरी टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यह कदम द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकता है. भारत ने यह संकल्प दोहराया है कि वह अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी उपलब्ध स्रोतों से किफायती तेल खरीदना जारी रखेगा. 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद से रियायती रूसी तेल ने भारत को अरबों डॉलर की बचत कराई है, लेकिन अब यह व्यापार भारत के वैश्विक वाणिज्यिक और रणनीतिक हितों के सामने एक चुनौती बनकर उभरा है.
व्यापार वार्ता और द्विपक्षीय संबंधों पर असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में व्यापार और शुल्कों को लेकर दोनों देशों के बीच पहले से ही कई विवाद रहे हैं. वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'अटलांटिक काउंसिल' के वरिष्ठ फेलो माइकल कुगेलमैन के अनुसार, द्विदलीय समर्थन वाला यह नया अमेरिकी कानून भारत-अमेरिका संबंधों के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है. इससे दोनों देशों के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में अविश्वास बढ़ सकता है.
तनाव के बावजूद, भारतीय रणनीतिकारों को उम्मीद है कि आगामी जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की संभावित मुलाकात से कोई कूटनीतिक समाधान निकल सकता है. साथ ही, भारत अपनी व्यापारिक निर्भरता को संतुलित करने के लिए यूके, यूरोपीय संघ और कनाडा के साथ नए व्यापार समझौतों पर तेजी से काम कर रहा है.
घरेलू राजनीति और ऐतिहासिक संदर्भ
भारत की कुल तेल आपूर्ति में रूसी तेल की हिस्सेदारी इस समय 40% से अधिक है. पूर्व में, अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय सामानों पर 50% तक का शुल्क लगाया गया था, जिसे बाद में तेल खरीद सीमित करने के वादे के आधार पर हटाया गया था. हालाँकि, 2026 में मध्य पूर्व में आए आपूर्ति संकट के बाद भारत को पुनः रूसी तेल के आयात में वृद्धि करनी पड़ी.
भारतीय विश्लेषकों और थिंक टैंक 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली है. 100% तक का दंडात्मक शुल्क न केवल भारतीय निर्यातकों और अमेरिकी उपभोक्ताओं को नुकसान पहुँचाएगा, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को भी बाधित करेगा. फिलहाल, भारत सरकार कूटनीतिक वार्ताओं के माध्यम से इस गतिरोध को सुलझाने और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का प्रयास कर रही है.

