ममता बनर्जी और कांग्रेस: एक राजनीतिक यात्रा का पूरा होता चक्र
रवीक भट्टाचार्य और सात्विक बर्मन की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों के संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और कांग्रेस के बीच चल रही खींचतान ने एक नया राजनीतिक मोड़ लिया है. अपनी पार्टी द्वारा कांग्रेस के साथ किसी भी चुनावी समझौते से स्पष्ट इनकार करने और नंदीग्राम से प्रत्याशी न उतारने के निर्णय के ठीक कुछ ही दिनों बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण घोषणा की. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी उपचुनाव में देश की सबसे पुरानी पार्टी (कांग्रेस) का समर्थन करेगी. यह घोषणा टीएमसी उम्मीदवार के मैदान से हटने के तुरंत बाद आई, जिसने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे दिया है.
कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर आयोजित एक पत्रकार वार्ता में ममता बनर्जी ने कहा, "आपसी संबंधों में बेहतर तालमेल और सौहार्द बनाए रखने के लिए हमने पहले ही यह तय कर लिया था कि हम नंदीग्राम में कांग्रेस का समर्थन करेंगे. यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर बने ‘इंडिया’ गठबंधन को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से लिया गया है. जहाँ तक रेजीनगर उपचुनाव का सवाल है, उस पर फैसला बाद में किया जाएगा." उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व राज्य कांग्रेस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि उन्होंने उपचुनावों के लिए ममता बनर्जी के सीट-बंटवारे के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ममता बनर्जी के लिए यह घटनाक्रम उनकी दशकों लंबी राजनीतिक यात्रा में एक पूरा चक्र (फुल सर्कल) घूम जाने जैसा है. एक समय जिस नेत्री ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस के मंच से की और वहीं से अपनी पहली बड़ी पहचान बनाई, फिर उसी कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और पश्चिम बंगाल से साढ़े तीन दशक पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका—आज वही ममता बनर्जी अपने करियर की सबसे कठिन राजनीतिक चुनौतियों से जूझते हुए अपनी मूल पार्टी का समर्थन करने को विवश हैं.
शुरुआती दौर और कांग्रेस के भीतर असंतोष
अपनी आत्मकथा ‘माई अनफॉरगेटेबल मेमोरीज़’ में ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती संघर्षों का विस्तार से उल्लेख किया है. वे लिखती हैं कि सक्रिय राजनीति में उनका प्रवेश उनके पिता के असमय निधन के दौर में हुआ था. उस समय वे कोलकाता के प्रसिद्ध जोगमाया देवी कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं. उन्होंने कॉलेज में ‘छात्र परिषद’ की इकाई गठित करने में मुख्य भूमिका निभाई और वामपंथी छात्र संगठनों से सीधा मुकाबला किया.
1970 के दशक में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद ममता ने कांग्रेस संगठन में तेज़ी से अपनी पहचान बनाई. आपातकाल के बाद की एक चर्चित घटना का ज़िक्र करते हुए वे लिखती हैं कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई कोलकाता यात्रा पर आए थे, तब उन्होंने उन्हें काले झंडे दिखाए थे. हालाँकि, इस जुझारूपन के बीच भी वे कांग्रेस की आंतरिक कार्यसंस्कृति से असहज थीं. उनका मानना था कि केंद्रीय नेतृत्व क्षेत्रीय नेताओं की अत्यधिक सक्रियता को पसंद नहीं करता. वे लिखती हैं कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनसे केवल सीमित भाषण देने, नियमित रिपोर्ट भेजने और चंदा जुटाने की उम्मीद रखता था, जिसे वे वास्तविक राजनीतिक सक्रियता नहीं मानती थीं.
1984 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े उलटफेरों में से एक को अंजाम दिया. उन्होंने वामपंथ के अभेद्य गढ़ माने जाने वाले जादवपुर संसदीय क्षेत्र से सीपीआई (एम) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को पराजित किया. ममता लिखती हैं कि उन्हें अपनी जीत पर पूरा भरोसा तो नहीं था, लेकिन वे बिना लड़े एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं थीं. इस चुनाव में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन ने भी उनके लिए प्रचार किया था.
कांग्रेस से मतभेद और टीएमसी का गठन
1990 के दशक तक ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में वामपंथ विरोधी राजनीति का सबसे प्रमुख चेहरा बन चुकी थीं. 1993 में चुनावी गड़बड़ियों के विरोध में 'राइटर्स बिल्डिंग' के घेराव के दौरान पुलिस गोलीबारी में 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई, जिसे आज भी 'शहीद दिवस' के रूप में मनाया जाता है.
तमाम लोकप्रियता के बावजूद कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनके मतभेद गहराते गए. ममता का आरोप था कि दिल्ली में बैठा नेतृत्व सीपीआई(एम) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने से कतराता है और उसने राज्य में वाम-विरोधी कट्टरपंथी नेताओं को दरकिनार कर नरमपंथियों को शह दी है. अंततः, 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर 'तृणमूल कांग्रेस' का गठन किया.
इसके बाद ममता ने राष्ट्रीय स्तर पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ हाथ मिलाया और 1999 में रेल मंत्री बनीं. 2004 का लोकसभा चुनाव टीएमसी और भाजपा ने मिलकर लड़ा, लेकिन वाममोर्चे के सामने उन्हें असफलता मिली. 2006 के राज्य चुनावों में करारी हार के बाद ममता ने भाजपा से दूरी बना ली.
सत्ता का शिखर और गठबंधन के बदलते रूप
सिंगूर और नंदीग्राम के ऐतिहासिक भूमि आंदोलनों ने ममता बनर्जी की राजनीति को नई दिशा दी. 2009 में वे केंद्र की यूपीए-2 सरकार में शामिल हुईं और 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर दिया.
हालाँकि, सत्ता में आने के बाद कांग्रेस और टीएमसी के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे. टीएमसी ने राज्य में कांग्रेस के आधार को तेज़ी से समेटा, जिससे कई बड़े कांग्रेस नेता टीएमसी में शामिल हो गए. सितंबर 2012 में नीतिगत मतभेदों के कारण ममता ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया. 2016 के चुनाव में कांग्रेस ने वामदलों के साथ गठबंधन कर टीएमसी को चुनौती दी, लेकिन ममता बनर्जी भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में बनी रहीं.
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 18 सीटें जीतने के बाद राज्य में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए. 2021 में ममता ने भाजपा को रोककर फिर से राज्य में अपनी सत्ता कायम की, जबकि कांग्रेस और वामदल शून्य पर सिमट गए.
2024 का परिदृश्य और वर्तमान छटपटाहट
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में 'इंडिया' गठबंधन का गठन हुआ, लेकिन बंगाल में सीट-बंटवारे पर बात नहीं बन सकी. ममता बनर्जी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया और राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' से भी दूरी बनाए रखी.
परंतु, वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में—जहाँ अंदरूनी बगावत, कानूनी अड़चनों और प्रशासनिक चुनौतियों के कारण उनकी पार्टी दबाव में है—ममता बनर्जी एक बार फिर अपनी पुरानी जड़ों और 'इंडिया' गठबंधन के प्रति लचीला रुख अपना रही हैं. नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने का यह निर्णय केवल एक चुनावी कदम नहीं है, बल्कि अपनी राजनीतिक ज़मीन को सुरक्षित रखने और राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बने रहने की एक सोची-समझी रणनीति है.

