सत्या निकेतन हादसा: दिल्ली की व्यवस्था एक और त्रासदी का इंतजार क्यों कर रही है?
एस. विक्रम के मुताबिक, 6 सितंबर 2026 की दोपहर दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास पांच मंजिला इमारत ढह गई. यह इमारत युवाओं के लिए पीजी आवास के रूप में इस्तेमाल हो रही थी. इसके बेसमेंट में निर्माण कार्य चल रहा था. यह हादसा कोई अलग घटना नहीं है. सत्या निकेतन में 2019 और 2022 में भी इमारतें गिर चुकी हैं. दोनों बार अनधिकृत निर्माण और नवीनीकरण के दौरान मजदूर मलबे में दबे. नोटिस जारी हुए, जांच के आदेश दिए गए, लेकिन व्यवस्था में कोई स्थायी बदलाव नहीं आया.
इस बार मृतकों की संख्या और उनकी पहचान अलग हो सकती है, लेकिन हादसे की बुनियादी वजह वही है. दिल्ली में छात्रों और कामकाजी युवाओं के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की भारी कमी है. इस कमी को पूरा करने के लिए अनौपचारिक पीजी व्यवस्था तेजी से बढ़ी है. सत्या निकेतन, मुखर्जी नगर और ओल्ड राजेंद्र नगर जैसे इलाकों में मकानों को बिना पर्याप्त अनुमति के पीजी, हॉस्टल और किराये के कमरों में बदला जा रहा है. बेसमेंट खोदे जा रहे हैं, मंजिलें जोड़ी जा रही हैं और भवनों की मूल संरचना से छेड़छाड़ की जा रही है.
दिल्ली विश्वविद्यालय अपने कुल छात्रों के एक छोटे हिस्से को ही हॉस्टल की सुविधा दे पाता है. देश में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात 2001-02 में 12.2 प्रतिशत था, जो अब लगभग 28 प्रतिशत तक पहुंच गया है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने 2035 तक इसे 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है. लेकिन छात्रावासों का विस्तार उस अनुपात में नहीं हुआ. जिस व्यवस्था को सीमित संख्या में छात्रों के लिए बनाया गया था, वह अब कई गुना बड़े छात्र समुदाय की जरूरत पूरी करने में असमर्थ है.
सरकार ने इस समस्या को पहचानते हुए 2020 में किफायती किराये के आवास की योजना शुरू की थी. इसमें छात्रों, प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों को लाभार्थी माना गया. लेकिन फरवरी 2025 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, इस योजना के केवल लगभग सात प्रतिशत आवास ही आवंटित हो पाए थे. यानी नीति और योजना मौजूद थी, लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं हुआ.
समस्या केवल आवास की कमी तक सीमित नहीं है. दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था का एक स्थायी पैटर्न बन चुका है — नोटिस जारी करना और उसके बाद कार्रवाई न करना. 2022 के सत्या निकेतन हादसे से पहले भवन मालिक को अनधिकृत नवीनीकरण के लिए नोटिस दिया गया था. फिर भी निर्माण कार्य नहीं रुका और न ही इमारत को सील किया गया. इसी तरह अप्रैल 2026 में हौज रानी के मालवीय नगर में एक अवैध होटल में आग लगी, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई. होटल को केवल छह कमरों की अनुमति थी, जबकि वहां 25 कमरे संचालित हो रहे थे. बेसमेंट भी अवैध रूप से खोदा गया था और बाहर निकलने का एक रास्ता बंद था.
दिल्ली की नगर निकाय व्यवस्था के पास इतने बड़े शहर की निगरानी के लिए पर्याप्त तकनीकी क्षमता भी नहीं है. एक समय तीनों नगर निगमों के पूरे क्षेत्र में भवनों की सुरक्षा जांच के लिए केवल 74 संरचनात्मक इंजीनियर सूचीबद्ध थे. इसके मुकाबले दिल्ली में हर साल लगभग 45 हजार नई इमारतें बनती हैं और कुल भवनों की संख्या करीब 30 लाख है. ऐसी स्थिति में कागजी निरीक्षण तो संभव है, लेकिन वास्तविक निगरानी नहीं.
इस संकट की जड़ दिल्ली की असफल शहरी योजना में भी है. दिल्ली विकास प्राधिकरण की भूमि पूलिंग नीति 2013 में तैयार हुई और 2018 में अधिसूचित की गई. इसका उद्देश्य शहर की सीमा पर कृषि भूमि को एकत्र कर नियोजित और बुनियादी सुविधाओं से युक्त आवासीय क्षेत्र विकसित करना था. लेकिन अब तक पात्र भूमि का केवल लगभग पांचवां हिस्सा ही पूल हो पाया है. जिन तीन मॉडल क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी, वे भी बुनियादी पात्रता पूरी नहीं कर सके हैं.
इस देरी के लिए लंबे समय तक केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव को जिम्मेदार ठहराया गया. लेकिन 2025 के बाद केंद्र और दिल्ली दोनों में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने के बावजूद स्थिति में खास सुधार नहीं आया. इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था से जुड़ी है जिसमें अनधिकृत कॉलोनियों और अवैध निर्माण को नियमित करना राजनीतिक रूप से अधिक लाभकारी माना जाता है. नियोजित आवास तैयार करने में वर्षों लगते हैं, जबकि अवैध बस्तियों को नियमित करने का फैसला तुरंत राजनीतिक लाभ दे सकता है.
दिल्ली की भौगोलिक स्थिति भी इस संकट को गंभीर बनाती है. दिल्ली भूकंपीय क्षेत्र चार में स्थित है, जो भारत की उच्च जोखिम वाली श्रेणियों में शामिल है. दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2015 में कहा था कि केवल 10 से 15 प्रतिशत इमारतें ही भूकंपरोधी मानकों का पालन करती हैं. बाद में एक अन्य पीठ ने लगभग 90 प्रतिशत इमारतों को भूकंप के लिहाज से असुरक्षित बताया. विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में बड़े भूकंप की स्थिति में मृतकों की संख्या डेढ़ लाख से ढाई लाख तक पहुंच सकती है.
सत्या निकेतन का हादसा केवल एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है. यह उस भवन व्यवस्था का परिणाम है जिसमें न तो पर्याप्त इंजीनियरिंग जांच होती है, न निर्माण नियमों का पालन और न ही समय पर कार्रवाई. अवैध बेसमेंट खुदाई से होने वाला ढहना और भूकंप से होने वाला ढहना अलग घटनाएं दिखाई दे सकती हैं, लेकिन दोनों की जड़ एक ही है — कमजोर नियमन, अनियोजित निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता.
इस संकट का असर सभी पर समान नहीं पड़ता. किराये के बाजार में धार्मिक और जातिगत भेदभाव के कारण कई परिवार और छात्र पहले से ही सीमित इलाकों में रहने को मजबूर होते हैं. मुस्लिम आवेदकों को मकान मिलने की संभावना कम होने और कश्मीरी छात्रों को किराये के मकानों से दूर किए जाने जैसी घटनाएं बताती हैं कि आवास का संकट सामाजिक बहिष्कार से भी जुड़ा हुआ है. जिन समुदायों को खुले बाजार में जगह नहीं मिलती, वे अक्सर उन्हीं इलाकों में रहने को मजबूर होते हैं जहां भवन सुरक्षा सबसे कमजोर है.
छात्रों पर दबाव केवल आवास तक सीमित नहीं है. प्रतियोगी परीक्षाओं की संस्कृति, सीमित सीटों की संख्या और सफलता को लेकर सामाजिक दबाव ने मानसिक संकट को भी बढ़ाया है. कोटा जैसे शहरों में पिछले दशक में लगभग 150 छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई. शिक्षा व्यवस्था युवाओं से लगातार प्रदर्शन की अपेक्षा करती है, लेकिन असफलता, दोबारा प्रयास और वैकल्पिक रास्तों के लिए पर्याप्त सामाजिक या संस्थागत समर्थन उपलब्ध नहीं कराती.
भारत के सामने रोजगार का संकट भी जुड़ा हुआ है. सेवा क्षेत्र और वैश्विक क्षमता केंद्रों का विस्तार हुआ है, लेकिन आईटी और बीपीएम क्षेत्र में रोजगार पाने वालों की संख्या देश के हर साल तैयार होने वाले स्नातकों की तुलना में बहुत कम है. विनिर्माण क्षेत्र में भी रोजगार की हिस्सेदारी लंबे समय से सीमित है. इसलिए युवाओं की बढ़ती संख्या, शिक्षा, आवास और रोजगार की समस्याएं एक-दूसरे से जुड़कर बड़ा संकट पैदा कर रही हैं.
सत्या निकेतन हादसा यह स्पष्ट करता है कि केवल नई जांच समिति या नया कानून पर्याप्त नहीं होगा. भूमि पूलिंग, भवन सुरक्षा नियम, किफायती किराये के आवास, किरायेदारी कानून और शिक्षा नीति पहले से मौजूद हैं. असली समस्या इनके क्रियान्वयन की है. जब तक सरकार कागजी नोटिस के बजाय वास्तविक कार्रवाई, नियोजित आवास और जवाबदेह प्रशासन को प्राथमिकता नहीं देती, तब तक सत्या निकेतन जैसी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि आने वाली बड़ी त्रासदियों की चेतावनी बनी रहेंगी.
एस. विक्रम राजनीतिक टिप्पणीकार हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है. मूल लेखा यहां पढ़ा जा सकता है.

