श्रीनाथजी मंदिर चोरी पर नेहरू का निर्णायक जवाब राम मंदिर डकैती पर मोदी की चुप्पी को बेनकाब करता है

‘द वायर’ में एस. एन. साहू का लेख दो अलग-अलग कालखंडों में भारत के दो प्रमुख धार्मिक स्थलों—18वीं शताब्दी के नाथद्वारा (राजस्थान) के श्रीनाथजी मंदिर और वर्तमान समय में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) के राम मंदिर—में हुए वित्तीय गबन, परिसंपत्तियों की चोरी और उन पर देश के शीर्ष नेतृत्व (जवाहरलाल नेहरू बनाम नरेंद्र मोदी) की प्रतिक्रियाओं का एक आलोचनात्मक और तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करता है. साहू ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और कानूनी नजीरों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि जनभावनाओं से जुड़े धार्मिक स्थलों में होने वाले भ्रष्टाचार पर राज्य की प्रतिक्रिया कैसे बदली है.

घटना की शुरुआत 13 नवंबर, 1958 को होती है, जब मंगलदास पकवासा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को राजस्थान के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर में भारी वित्तीय अनियमितताओं की जानकारी दी. मंदिर के तत्कालीन संरक्षक (एक महाराजा) पर मंदिर से सोना, चांदी और बड़ी मात्रा में नकदी चोरी करने के गंभीर आरोप थे.

नेहरू की त्वरित और सख्त प्रतिक्रिया

नेहरू ने इस कृत्य को सामान्य चोरी न मानकर सार्वजनिक धन का गबन और 'डकैती' करार दिया. उन्होंने तुरंत राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया और केंद्रीय गृह मंत्री जी.बी. पंत को पत्र लिखकर कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए. नेहरू ने स्पष्ट किया कि जांच में ढिलाई के कारण ही आरोपी को गबन का मौका मिला.

जब महाराजा ने राजस्थान सरकार द्वारा गठित 'न्यायाधीश के.एन. वांचू समिति' का विरोध किया और समिति काम नहीं कर सकी, तो नेहरू ने तीखी नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं से सरकारों की साख गिरती है. उन्होंने सवाल उठाया कि कोई भी धार्मिक व्यक्ति मंदिर प्रशासन की ऐसी दोषपूर्ण व्यवस्था को कैसे बर्दाश्त कर सकता है.

नेहरू का मानना था कि उक्त महंत या महाराज का धर्म या आध्यात्मिकता से कोई लेना-देना नहीं था. उन्होंने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि मंदिर की आय का उपयोग आध्यात्मिक कार्यों के बजाय 'राजनीतिक उद्देश्यों' के लिए और व्यक्तियों के निजी लालच को पूरा करने के लिए किया जा रहा था, जो कि जनता की आस्था का घोर शोषण था.

लेख का दूसरा और अधिक तीखा हिस्सा 1958 की घटना की तुलना वर्तमान अयोध्या राम मंदिर विवाद से करता है. लेखक का आरोप है कि नेहरू की सक्रियता के विपरीत, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में भक्तों द्वारा दान किए गए सोने, चांदी और नकदी की भारी चोरी की खबरों पर पूरी तरह मौन हैं.

साहू के अनुसार, बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण हमेशा से भाजपा का एक प्रमुख राजनीतिक प्रोजेक्ट रहा है, जिसका उपयोग जनभावनाओं को भड़काने और सत्ता हासिल करने के लिए किया गया. सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को "कानून के शासन का घोर उल्लंघन" माना था, जो केवल दक्षिणपंथी नेताओं के बड़े पैमाने पर किए गए लामबंदी (मास मोबिलाइजेशन) के कारण संभव हुआ.

प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त 'राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के कुछ सदस्यों पर जमीन अधिग्रहण में करोड़ों रुपये के घोटाले और निर्माण कार्यों के वर्क ऑर्डर देने के बदले 40% कमीशन लेने के गंभीर आरोप लगे.

प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव और ट्रस्टी नृपेन्द्र मिश्रा ने खुद स्वीकार किया कि राम मंदिर में जो हुआ वह सिर्फ चोरी नहीं बल्कि 'डकैती' थी. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद फरवरी 2024 में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की थी और "राम ही राष्ट्र हैं" का नारा दिया था. लेखक का तर्क है कि इस नाते देश के प्रतीक स्थल पर हुई चोरी को देश पर अपराध माना जाना चाहिए था, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस डकैती पर गहरा मौन साध रखा है. चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे शीर्ष ट्रस्टियों का बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के केवल इस्तीफा करा दिया गया और केवल कुछ छोटे आरोपियों को ही पकड़ा गया है.

दोनों मामलों में एक बड़ा अंतर कानूनी और प्रशासनिक नियंत्रण का भी है. श्रीनाथजी मंदिर मामले में नेहरू के हस्तक्षेप के बाद राजस्थान सरकार ने 'नाथद्वारा मंदिर अधिनियम, 1959' बनाया, ताकि भक्तों के दान का प्रबंधन पारदर्शी हो सके. यह मंदिर उत्तर प्रदेश विधानमंडल या संसद के किसी विशेष अधिनियम द्वारा संचालित नहीं है, बल्कि कोर्ट के आदेश पर सरकार द्वारा घोषित एक ट्रस्ट द्वारा संचालित है. और यह पूरी तरह राज्य और वैधानिक नियमों के नियंत्रण में है. जबकि राम मंदिर ट्रस्ट को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे से बाहर रखा गया है, जिससे पारदर्शिता का अभाव है.

 जब नाथद्वारा के महाराजा ने इस सरकारी कानून को यह कहकर चुनौती दी कि मंदिर उनकी निजी संपत्ति है और इसमें राज्य का हस्तक्षेप उनके धार्मिक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन है, तो 21 जनवरी, 1963 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया.

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि: "मंदिर की संपत्तियों और बहुमूल्य आभूषणों के प्रबंधन का अधिकार विशुद्ध रूप से एक धर्मनिरपेक्ष मामला है. इसे धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता. इसलिए, मूर्ति पर चढ़ाए जाने वाले कीमती आभूषणों की सुरक्षा पूरी तरह से सरकारी बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आती है."

लेख का मुख्य निष्कर्ष यह है कि यदि 1963 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के सिद्धांत को अयोध्या मामले पर लागू किया जाए, तो राम मंदिर के आभूषणों और धन की सुरक्षा एक धर्मनिरपेक्ष जिम्मेदारी थी, जिसे बनाए रखने में मौजूदा व्यवस्था विफल रही है. जहां 1958 में नेहरू ने त्वरित विधायी और दंडात्मक कदम उठाकर कानून के शासन और नैतिक लोकाचार को स्थापित किया, वहीं वर्तमान में मंदिर में दान देने वाले अनगिनत भक्तों के भरोसे के टूटने पर मोदी की चुप्पी उनकी संलिप्तता (अपराध बोध) को दर्शाती है.

Previous
Previous

भारत में दहेज हत्याएं अब सार्वजनिक गुस्से या बहस को नहीं भड़कातीं, अध्ययन में खुलासा

Next
Next

भगवान कृष्ण की तरह किसी भी बच्चे को जेल में जन्म लेने का कलंक नहीं झेलना चाहिए: निदा खान के जमानत आदेश में अदालत ने कहा