‘नासा की मदद’ वाले धीरेंद्र शास्त्री के दावे फर्जी निकले, अंतरिक्ष एजेंसी ने संपर्क से किया इनकार

नासा ने बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री के उस दावे को ख़ारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने दावा किया था की उनकी टीम की नासा से बात हुई है और वो अपनी शक्तियों’ से वैज्ञानिकों की मदद करेंगे. लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि “ऐसे किसी आधिकारिक संपर्क की जानकारी नहीं है.

‘द मूकनायक’ की रिपोर्ट के अनुसार, नासा को भेजे गए आधिकारिक ईमेल के जवाब में एजेंसी की कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट एलिज़ाबेथ शॉ ने कहा कि उन्हें “उल्लेखित व्यक्ति के साथ किसी भी आधिकारिक संपर्क की जानकारी नहीं है.” नासा ने यह भी स्पष्ट किया कि एजेंसी के पास धीरेंद्र शास्त्री, उनकी टीम या बागेश्वर धाम के किसी प्रतिनिधि के साथ बातचीत का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

कुछ समय पहले एक धार्मिक कथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने दावा किया था कि उनकी टीम की कुछ वैज्ञानिकों से बातचीत हुई है और वह नासा के वैज्ञानिकों तथा अंतरिक्ष यात्रियों की सहायता करेंगे. उनके इस बयान का सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार हुआ और समर्थकों ने इसे “भारतीय आध्यात्मिक शक्ति” की मान्यता के रूप में पेश किया.

हालांकि जांच में ऐसा कोई दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड या विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि नासा और बागेश्वर धाम के बीच किसी प्रकार का संवाद हुआ था. इसी कारण धीरेंद्र शास्त्री का दावा अब सवालों के घेरे में है.

धीरेंद्र शास्त्री का पक्ष जानने के लिए जब मूकनायक ने बागेश्वर धाम के आधिकारिक नंबर पर संपर्क किया  तो फोन उठाने वाली महिला ने कहा कि “गुरुजी ध्यान में हैं” और मामले की जानकारी होने से इनकार किया. उसने किसी अधिकारी का संपर्क नंबर देने से भी मना कर दिया.

इस मामले में इसरो से भी संपर्क किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक वहां से कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला था.

पहले भी विवादों में रहे हैं धीरेंद्र शास्त्री

धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री पिछले कुछ वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हुए हैं. उनके “दिव्य दरबार” कार्यक्रमों में लोगों की समस्याएं और मन की बातें जान लेने के दावों को उनके समर्थक चमत्कार मानते हैं. वहीं कई तर्कवादी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन दावों को अंधविश्वास करार दिया है.

‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ सहित कई संगठनों ने उनके खिलाफ शिकायतें भी दर्ज कराई हैं. हिंदू राष्ट्र, धर्मांतरण और राजनीतिक बयानों को लेकर भी वह कई बार विवादों में रह चुके हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई सार्वजनिक व्यक्ति वैज्ञानिक संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जुड़े दावे करता है तो तथ्यों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. बिना प्रमाण वाले बयान लोगों के बीच भ्रम पैदा कर सकते हैं और अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकते हैं.

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