भारत में चिप्स और कोल्ड ड्रिंक पर लाल चेतावनी लेबल की तैयारी थी, बड़ी कंपनियों के विरोध के बाद बदला रुख
आदित्य कालरा और रिचा नायडू के मुताबिक, भारत में पैकेटबंद खाद्य और पेय पदार्थों पर ज्यादा चीनी, नमक और वसा को लेकर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने की कोशिश एक बार फिर बड़े खाद्य उद्योग और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के बीच टकराव का मुद्दा बन गई है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई पहले पैकेट के सामने रंगीन चेतावनी संकेत लगाने पर विचार कर रहा था, लेकिन बड़ी खाद्य और पेय कंपनियों के विरोध के बाद नियामक ने अपना रुख बदलते हुए काले-सफेद पोषण तालिका का प्रस्ताव रखा है. यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भी है.
विवाद का केंद्र यह सवाल है कि क्या उपभोक्ताओं को पैकेट के सामने ही साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है. दुनिया के करीब 20 देशों ने किसी न किसी रूप में ऐसी व्यवस्था अपनाई है, जिसमें ज्यादा चीनी, नमक या वसा वाले उत्पादों पर लाल चेतावनी और अपेक्षाकृत स्वस्थ विकल्पों के लिए हरे संकेत जैसे तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेट के सामने दी गई सरल और स्पष्ट जानकारी लोगों को बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकती है.
भारत में फिलहाल कंपनियों के लिए उत्पाद की सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के पीछे देना अनिवार्य है. एफएसएसएआई 2017 से कई तरह के प्रस्तावों पर विचार करता रहा है, जिनमें रंग आधारित चेतावनी और पोषण संबंधी स्टार रेटिंग भी शामिल थी. लेकिन अब तक कोई व्यापक फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी व्यवस्था लागू नहीं हो सकी.
रॉयटर्स ने 19 मार्च को एफएसएसएआई और खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक की रिकॉर्डिंग, सरकारी और कॉरपोरेट दस्तावेजों की समीक्षा की. रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में कंपनियों ने रंगीन चेतावनी लेबल का कड़ा विरोध किया. कोका-कोला इंडिया की एक वरिष्ठ अधिकारी ने तर्क दिया कि केवल किसी उत्पाद पर प्रतीक या चेतावनी लगाने से उन उपभोक्ताओं की खानपान की आदतें जरूरी नहीं बदलेंगी जो पहले से ही सामग्री की सूची नहीं पढ़ते. कंपनियों ने यह भी कहा कि नियामकों को चेतावनी लेबल के बजाय सीमित मात्रा में सेवन यानी पोर्शन कंट्रोल को बढ़ावा देना चाहिए.
लेकिन इस बहस में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आता है. कोका-कोला और उससे जुड़ी कंपनियां यूरोप के कई बाजारों में अपने उत्पादों पर ट्रैफिक लाइट जैसी पोषण संबंधी जानकारी स्वेच्छा से देती हैं. नेस्ले भी ब्रिटेन में लंबे समय से ऐसे लेबल का इस्तेमाल करती रही है. इसके बावजूद भारत में अधिक स्पष्ट और रंग आधारित चेतावनी प्रणाली के प्रति उद्योग का विरोध बना हुआ है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट ने भारत और दूसरे देशों में बिकने वाले एक ही ब्रांड के उत्पादों की सामग्री में अंतर पर भी सवाल उठाए हैं. उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में बिकने वाले फैंटा की तुलना में भारत में मिलने वाले उसी ब्रांड के उत्पाद में चीनी की मात्रा करीब तीन गुना अधिक बताई गई है. भारतीय संस्करण में कृत्रिम रंग भी शामिल है, जबकि यूरोप में कुछ रंगों के इस्तेमाल के साथ प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनी देना जरूरी है. भारत में इस तरह की जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है.
इसी तरह नेस्ले के किटकैट और मैगी जैसे उत्पादों के भारतीय और विदेशी संस्करणों में भी अंतर बताया गया है. भारत में बिकने वाले सामान्य किटकैट में कोको की मात्रा ऑस्ट्रेलियाई संस्करण की तुलना में काफी कम है. भारत में बिकने वाली मैगी में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्रिटेन में मिलने वाले कई संस्करणों में सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल किया जाता है. ब्रिटेन में बिकने वाले कई मैगी पैकेटों पर सामने की ओर नमक की मात्रा को लेकर रंग आधारित चेतावनी भी दी जाती है.
यही अंतर सोशल मीडिया पर उपभोक्ताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बहस का विषय बन गया है. कई इन्फ्लुएंसर और स्वास्थ्य कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि भारतीय उपभोक्ताओं को दूसरे देशों की तुलना में अलग और कथित तौर पर कम गुणवत्ता वाले उत्पाद क्यों दिए जा रहे हैं. कंपनियों और उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अलग-अलग देशों में स्वाद, कीमत, स्थानीय नियम और उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता के आधार पर उत्पादों की सामग्री बदलती है.
भारत में स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंता इस विवाद को और महत्वपूर्ण बनाती है. एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग मोटापे या अधिक वजन की समस्या से प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के बारे में स्पष्ट जानकारी देना सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का अहम हिस्सा होना चाहिए.
मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. फरवरी में अदालत ने नियामकों से चेतावनी लेबल के मुद्दे पर विचार करने को कहा था और इजराइल की लाल-हरे संकेत वाली व्यवस्था का अध्ययन करने का सुझाव दिया था. लेकिन उद्योग के साथ मार्च की बैठक के बाद एफएसएसएआई ने रंग आधारित चेतावनी प्रणाली से दूरी बना ली. अगस्त में नियामक ने अदालत को बताया कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारतीय पैकेजिंग व्यवस्था में सीधे लागू करना मुश्किल है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि दुनिया को यह पता होना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर है.
बदलते उपभोक्ता व्यवहार का असर कंपनियों पर भी दिखाई दे रहा है. नेस्ले ने 2024 में भारत में बिना चीनी वाला सेरेलैक बेचने की घोषणा की थी. इससे पहले लंबे समय से सवाल उठते रहे थे कि भारत में केवल चीनी वाला संस्करण क्यों बेचा गया, जबकि दूसरे देशों में बिना चीनी वाला उत्पाद पहले से उपलब्ध था. दूसरी तरफ, खाद्य उद्योग का कहना है कि रंग आधारित चेतावनी हमेशा किसी उत्पाद की पूरी पोषण तस्वीर नहीं दिखाती. उदाहरण के तौर पर, प्राकृतिक रूप से मौजूद चीनी वाले नारियल पानी पर भी "हाई शुगर" जैसी चेतावनी लगने की संभावना बताई गई है.
भारत का पैकेटबंद खाद्य और पेय बाजार 100 अरब डॉलर से अधिक का है और उद्योग के अनुमान के अनुसार इसके करीब 80 प्रतिशत उत्पादों को ज्यादा वसा, चीनी या नमक वाला माना जा सकता है. इसलिए यदि लाल चेतावनी लेबल जैसी व्यवस्था लागू होती है तो उसका असर पूरे उद्योग पर पड़ सकता है. यही कारण है कि यह बहस केवल पैकेजिंग या लेबलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, उपभोक्ता अधिकार और बड़े कारोबार के हितों के बीच एक बड़ी लड़ाई बन चुकी है.
अब एफएसएसएआई और सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम यह तय करेंगे कि भारतीय उपभोक्ताओं को भविष्य में अपने पसंदीदा चिप्स, कोल्ड ड्रिंक, नूडल्स और अन्य पैकेटबंद उत्पादों के सामने साफ चेतावनी दिखाई देगी या फिर पोषण संबंधी जानकारी छोटे अक्षरों और तकनीकी तालिकाओं तक ही सीमित रहेगी.
(यह रॉयटर्स में प्रकाशित आदित्य कालरा और रिचा नायडू की रिपोर्ट का हिंदी में अनूदित और संक्षिप्त अंश है.)

