सत्य सागर | भारत में जो हो रहा है, वह ‘अघोषित आपातकाल’ नहीं, गणराज्य के खिलाफ खुला तख्तापलट है
'काउंटरकरंट्स' में सत्य सागर ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में बढ़ता सत्तावाद केवल ‘अघोषित आपातकाल’ नहीं, बल्कि भारतीय गणराज्य और उसकी संवैधानिक नींव को बदलने की एक व्यापक परियोजना है.
1975-77 के आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने मौलिक अधिकार निलंबित किए, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई थी. इसके विपरीत, मौजूदा दौर में चुनाव और लोकतंत्र की औपचारिक संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन गणराज्य के मूल अर्थ को भीतर से बदला जा रहा है. इस बदलाव के केंद्र में हिंदुत्व की विचारधारा है, जो भारतीय राष्ट्र की पहचान को एकरूप हिंदू पहचान के तहत परिभाषित करना चाहती है.
हिंदुत्व और भारत की बहुलतावादी पहचान
भारत की सभ्यता में आदिवासी समाज, द्रविड़ संस्कृतियां, बौद्ध-जैन परंपराएं, सिख इतिहास, इस्लामी और ईसाई संस्कृतियां, पूर्वोत्तर के समुदाय तथा अनेक क्षेत्रीय भाषाएं और परंपराएं शामिल हैं. किसी एक सांस्कृतिक परंपरा को पूरे देश की पहचान तय करने का अधिकार देना इस विविधता के लिए चुनौती है.
अयोध्या विवाद इसका प्रमुख उदाहरण है. 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन बताया और माना कि मुसलमानों को गलत तरीके से मस्जिद से वंचित किया गया. इसके बावजूद विवादित स्थल राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट को सौंप दिया गया और मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश दिया गया. जनवरी 2024 में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका ने राज्य और एक खास धार्मिक-राष्ट्रीय परियोजना के बीच की दूरी को और कम किया. इससे समान नागरिकता के संवैधानिक वादे और राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले धार्मिक प्रतीकों के बीच खाई बढ़ी.
संघवाद और सत्ता का केंद्रीकरण
अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित कर दिया. यह कदम निर्वाचित सरकार की अनुपस्थिति और व्यापक सुरक्षा तथा संचार प्रतिबंधों के बीच उठाया गया. दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बरकरार रखा और विधानसभा चुनाव कराने तथा राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया, लेकिन कोई समयसीमा तय नहीं की.
यह मामला केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है. निर्वाचित राज्य विधानसभा की सहमति के बिना राज्य की स्वायत्तता और दर्जा समाप्त करना संघवाद की कमजोरी को उजागर करता है. राज्यपालों की भूमिका, वित्तीय संसाधनों के बंटवारे और राज्य सरकारों की शक्तियों को लेकर विवाद भी केंद्र में सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण की ओर संकेत करते हैं.
कॉरपोरेट पूंजी और आर्थिक असमानता
भारत में कुछ बड़े कारोबारी समूहों का प्रभाव बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और मीडिया तक बढ़ा है. अडानी समूह इसका प्रमुख उदाहरण है, जो कमोडिटी कारोबार से आगे बढ़कर बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा, कोयला, सड़कों, सीमेंट और मीडिया में फैल गया. 2022 में गौतम अडानी कुछ समय के लिए दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बने थे और उनकी संपत्ति लगभग 158 अरब डॉलर आंकी गई थी.
आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत 1991 में हुई थी, लेकिन भाजपा ने इसे आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया. हिंदुत्व की राजनीति ने सांस्कृतिक गौरव को बड़े निजी पूंजी समूहों के अनुकूल आर्थिक मॉडल से जोड़ा. इस दौरान आर्थिक असमानता, असुरक्षित रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं तक असमान पहुंच जैसी समस्याएं बनी रहीं. इसलिए विपक्ष को रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक असमानता पर स्पष्ट वैकल्पिक कार्यक्रम देना होगा.
सेना, मीडिया और अल्पसंख्यक
2019 में पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमले के बाद नरेंद्र मोदी ने पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं से सैनिकों के नाम पर वोट देने की अपील की थी. 2025 में ऑपरेशन सिंदूर भी भाजपा के राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बना. सैन्य कार्रवाइयों को चुनावी प्रचार में इस्तेमाल करना सेना की राजनीतिक निष्पक्षता के लिए चिंता का विषय है.
मीडिया की स्वतंत्रता पर भी दबाव बढ़ा है. एनडीटीवी का अडानी समूह द्वारा अधिग्रहण, न्यूज़क्लिक के पत्रकारों पर छापे और आलोचनात्मक मीडिया संस्थानों से जुड़ी जांचों ने स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए मुश्किलें बढ़ाई हैं. मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, विज्ञापन पर निर्भरता और नियामकीय दबाव सार्वजनिक बहस को सीमित कर रहे हैं.
धार्मिक अल्पसंख्यकों को नफरत भरे अभियानों, गोरक्षा के नाम पर हिंसा और उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना घरों तथा कारोबारों को गिराने जैसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है. ‘बुलडोजर न्याय’ प्रशासन और सामूहिक दंड के बीच की सीमा को धुंधला करता है. ये घटनाएं धार्मिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं.
सामाजिक समर्थन और विपक्ष की चुनौती
राजनीतिक वैज्ञानिक अजय गुडावर्ती का तर्क है कि नरेंद्र मोदी के समर्थकों को केवल ‘अंधभक्त’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. उनके अनुसार, कई लोग अपनी जातिगत स्थिति और वर्गीय हितों की रक्षा के लिए इस राजनीति का समर्थन करते हैं. जातिगत असमानताएं वंचित समूहों में भी दूसरों से श्रेष्ठ होने की आकांक्षा पैदा कर सकती हैं, जबकि सांप्रदायिक राजनीति इन सामाजिक पदानुक्रमों को व्यापक राजनीतिक लामबंदी में बदल देती है.
भाजपा को चुनाव में हराना भर हिंदुत्व की परियोजना को पीछे धकेलने के लिए पर्याप्त नहीं होगा. विपक्ष को संवैधानिक प्रक्रियाओं की रक्षा और चुनावी गठबंधन से आगे बढ़कर सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, प्रगतिशील कर व्यवस्था और एकाधिकार पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर स्पष्ट कार्यक्रम देना होगा.
इसके साथ राज्यों, पंचायतों और नगरपालिकाओं को वास्तविक वित्तीय तथा राजनीतिक अधिकार देने, आदिवासी समुदायों की स्वायत्तता की रक्षा करने और दलितों, आदिवासियों, पिछड़ी जातियों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए समान नागरिकता सुनिश्चित करने की जरूरत है.
संविधान, चुनावी निष्पक्षता और असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए चल रहे आंदोलन तभी स्थायी बदलाव ला सकते हैं, जब वे सत्ता और संपत्ति के पुनर्वितरण, संघवाद को मजबूत करने और भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा के व्यापक प्रयास का हिस्सा बनें. लक्ष्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि एक बहुलतावादी, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और जवाबदेह गणराज्य की स्थापना होना चाहिए.
(यह हिंदी में अनूदित सारांश है. पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं.)

