गौतम मुखोपाध्याय | मणिपुर में बहिष्करण का एक रास्ता है ‘एसआईआर’

“द हिंदू” में गौतम मुखोपाध्याय ने लिखा है कि मणिपुर में मतदाता सूचियों का 'विशेष गहन पुनरीक्षण' जातीय संघर्ष, विस्थापन और पहचान की चुनौतियों के बीच (लोगों के) ‘बहिष्करण’ को और गहरा करने का जोखिम पैदा करता है. वह लिखते हैं कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) का तीसरा चरण चलाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत मणिपुर भी शामिल है. पूर्व में बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान इस प्रक्रिया की तीखी आलोचना हो चुकी है. आलोचकों और नागरिक समाज संगठनों का मानना है कि इस प्रक्रिया के तहत बिना उचित जांच और जल्दबाजी में बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे कई राजनैतिक रूप से "अवांछित" समुदायों को मताधिकार से वंचित होना पड़ रहा है.

इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, राज्य सरकार का कथित पक्षपात, और आगामी 2029 के चुनावों व नियोजित परिसीमन के साथ इसके अंतर्संबंधों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं. मणिपुर के संदर्भ में यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है क्योंकि राज्य वर्तमान में एक अभूतपूर्व सामाजिक और जातीय संकट से गुजर रहा है.

मणिपुर का खंडित सामाजिक ताना-बाना और हिंसा

मणिपुर वर्तमान में गंभीर जातीय संघर्ष की आग में झुलस रहा है. इस त्रिकोणीय संघर्ष में मुख्य रूप से तीन समुदाय शामिल हैं: मैतेई समुदाय: कुल आबादी का 54%, जो मुख्य रूप से इंफाल घाटी में निवास करते हैं. कुकी-ज़ो समुदाय: कुल आबादी का 15%, जो पहाड़ियों पर निवास करते हैं. मणिपुरी नागा: कुल आबादी का 26%, जो मुख्य रूप से उत्तरी हिस्से में रहते हैं.

इस हिंसा के परिणामस्वरूप अब तक 260 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, सैकड़ों गांवों और धार्मिक स्थलों को नष्ट किया जा चुका है और लगभग 60,000 लोग आंतरिक या बाह्य रूप से विस्थापित हुए हैं. कुकी-ज़ो समुदाय को इस हिंसा में अत्यधिक क्रूरता का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण वे अब अपने लिए एक 'अलग प्रशासन' की मांग कर रहे हैं, जिसका मैतेई समुदाय कड़ा विरोध कर रहा है. दूसरी ओर, नागा समुदाय (एनएससीएन-आईएम के नेतृत्व में) संप्रभु 'नागालिम' की अपनी दशकों पुरानी मांग पर अड़ा हुआ है.

इस बेहद तनावपूर्ण माहौल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह पंगु नजर आती है. संघर्ष के तीन साल बाद भी अदालतों के जरिए किसी मामले में सजा नहीं हुई है, गृह मंत्रालय का जांच आयोग अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप पाया है, और विस्थापित लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव में राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. हाल ही में कुकी पादरियों और नागा बंधकों की हत्याओं के बाद यह संघर्ष और गहरा गया है. ऐसे पक्षपातपूर्ण और अशांत माहौल में सामान्य स्थिति का दिखावा करते हुए मतदाता सूची का पुनरीक्षण (एसआईआर) करना तार्किक रूप से संदेहास्पद है.

चुनावी बहिष्कार को बढ़ावा देने वाले नैरेटिव (विमर्श)

देश के अन्य हिस्सों की तुलना में मणिपुर में एसआईआर का एजेंडा थोड़ा अलग और खतरनाक है. यहाँ बहुसंख्यक मैतेई और नागा समुदायों (जो कुल आबादी का 80% हैं) के भीतर कथित "अवैध प्रवासियों" को हटाने का एक मजबूत राजनैतिक विमर्श (नैरेटिव) चल रहा है, जो परोक्ष रूप से कुकी समुदाय को लक्षित करता है.

लेखक के अनुसार, इन आरोपों का पिछली एक सदी के जनगणना के आंकड़ों में कोई ठोस आधार नहीं मिलता. यह विमर्श इतिहास के विकृतिकरण, भ्रामक प्रचार और फेक नैरेटिव पर टिका हुआ है, जो सीधे तौर पर एसआईआर प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है. इसके कारण, विशेषकर मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में, निष्पक्ष मतदाता पुनरीक्षण का माहौल पूरी तरह समाप्त हो गया है.

कुकी-ज़ो समुदाय की विशिष्ट चुनौतियाँ और संवेदनशीलता

एसआईआर प्रक्रिया के कारण कुकी-ज़ो समुदाय के मतदाता सूची से बाहर होने का खतरा सबसे अधिक है, जिसके पीछे चार प्रमुख कारण हैं:

दस्तावेजों का अभाव और विस्थापन: लगभग 50,000 कुकी-ज़ो लोग विस्थापित और बिखरे हुए हैं. मई 2023 की हिंसा के दौरान इंफाल में बड़े पैमाने पर उनके पहचान पत्र (वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस, शैक्षिक प्रमाणपत्र आदि) जला दिए गए थे. उनकी निष्पक्ष गणना के लिए सरकार के पास कोई विशेष कार्ययोजना नहीं है.

नामकरण की जटिल प्रणाली: कुकी समुदाय की पारंपरिक नामकरण प्रणाली काफी पेचीदा है, जहाँ माता-पिता के नामों के अंतिम अक्षरों या उपनामों का उपयोग किया जाता है. आदिवासी नामों को जब अंग्रेजी में लिखा जाता है, तो वर्तनी (स्पेलिंग) की विसंगतियां होना आम बात है.  लगभग 90% कुकी-ज़ो लोगों के विभिन्न दस्तावेजों में नाम की स्पेलिंग एक जैसी नहीं है, जिससे वे तकनीकी आधार पर सूची से बाहर किए जा सकते हैं.

संवैधानिक संरक्षण की कमी: मणिपुर के आदिवासियों को संविधान की 'छठी अनुसूची' का दर्जा प्राप्त नहीं है. पूर्व में (जैसे 1990 के दशक की नागा-कुकी हिंसा में) ग्राम प्रधान या स्थानीय प्राधिकारी विस्थापित ग्रामीणों की पहचान प्रमाणित कर देते थे, लेकिन वर्तमान वैमनस्यपूर्ण माहौल में ऐसी व्यवस्थाओं को मान्यता मिलने की उम्मीद नहीं है.

नेतृत्व की उदासीनता: कुकी-ज़ो नेतृत्व इस एसआईआर प्रक्रिया के दूरगामी राजनैतिक खतरों के प्रति जागरूक नहीं था. वे नासमझी में यह मानते रहे कि सच्चे नागरिक होने के कारण उन्हें डरने की जरूरत नहीं है. हालांकि अब कुछ नागरिक संगठनों ने इस पर आवाज उठानी शुरू की है, लेकिन इसे अभी तक कोई मजबूत राजनैतिक रूप नहीं मिला है.

नागरिकता की रक्षा और भविष्य का संकट

यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद देशव्यापी एसआईआर एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता बन चुका है, लेकिन इसे अधिक मानवीय, संवेदनशील और निष्पक्ष बनाया जाना अत्यंत आवश्यक है. यदि विस्थापितों और आदिवासियों की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखकर सुरक्षात्मक उपाय नहीं किए गए, तो 2029 तक पूर्वोत्तर के कई आदिवासी समुदाय (विशेषकर कुकी-ज़ो) पूरी तरह से 'राज्यविहीन' (यानी बिना नागरिकता के) हो सकते हैं. यह संकट वैसा ही रूप ले सकता है जैसा "अवैध प्रवासी" के नाम पर अन्य क्षेत्रों में कुछ समुदायों के बड़े पैमाने पर बहिष्कार के दौरान देखा गया है.

(लेखक गौतम मुखोपाध्याय म्यांमार, अफगानिस्तान और सीरिया में भारत के राजदूत रह चुके हैं, और भारत के पूर्वोत्तर के मुद्दों से जुड़े हुए हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

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