डॉ. रवि चतुर्वेदी | सार्वजनिक जगहें अब भी महिलाओं के लिए सुरक्षित क्यों नहीं हैं
‘काउंटरकरंट्स’ में डॉ. रवि चतुर्वेदी ने लिखा है कि जब कोई किशोरी घर से बाहर निकलती है तो समाज की जिम्मेदारी केवल यह सुनिश्चित करना नहीं होनी चाहिए कि अपराध होने के बाद पुलिस कार्रवाई करे. सवाल यह है कि क्या सुरक्षा अपराध होने से पहले शुरू नहीं होनी चाहिए और क्या सार्वजनिक स्थानों की संरचना तथा संस्थागत व्यवस्था को इस तरह तैयार नहीं किया जाना चाहिए कि जोखिम को पहले ही कम किया जा सके.
बिहार और दिल्ली में किशोरियों से जुड़ी हाल की घटनाएं इस सवाल को गंभीर बनाती हैं. जमुई में कोचिंग से लौट रही दो किशोरियों को कथित तौर पर एक समूह ने रोका और उनके साथ मारपीट की. एक लड़की के साथ कथित छेड़छाड़ का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ. समस्तीपुर में भी एक किशोरी के साथ दिनदहाड़े सड़क पर कथित रूप से दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना सामने आई. दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में पुलिस के अनुसार, तीन लोगों ने पुलिसकर्मी बनकर 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित यौन हिंसा की.
इन मामलों की परिस्थितियां अलग हैं और आरोपों की पुष्टि कानूनी प्रक्रिया के जरिए होनी है. लेकिन तीनों घटनाएं रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान हुईं- कोचिंग से लौटते समय, सार्वजनिक सड़क पर और पार्क में.
लेख के अनुसार, हम अक्सर असुरक्षित जगह की कल्पना सुनसान, अंधेरी और देर रात वाली सड़क के रूप में करते हैं. लेकिन जोखिम केवल ऐसी जगहों तक सीमित नहीं है. दिन के समय सार्वजनिक सड़क, मोहल्ला, पार्क या कोई संस्थान भी ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकता है जहां किसी व्यक्ति के लिए मदद हासिल करना कठिन हो.
आंकड़े बताते हैं कि समस्या व्यापक है
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत में बाल यौन अपराध संरक्षण कानून के तहत 69,191 मामले दर्ज हुए, जो बच्चों के खिलाफ दर्ज 1,87,702 अपराधों का 36.9 प्रतिशत थे. 2023 में ऐसे मामलों की संख्या 67,694 थी. ये केवल दर्ज मामले हैं और वास्तविक घटनाओं की पूरी तस्वीर नहीं बताते.
दिल्ली की आस्था कुंज घटना में रिपोर्टिंग के दौरान सीसीटीवी कवरेज, प्रवेश बिंदुओं की निगरानी और कुछ हिस्सों में रोशनी को लेकर कमियां सामने आईं. हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि इनमें से किसी एक कमी के कारण अपराध हुआ. लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि किसी सार्वजनिक स्थान पर संकट में फंसे व्यक्ति को कितनी जल्दी देखा और मदद दी जा सकती है.
भारत में सुरक्षा के लिए कई व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं. केंद्र की सेफ सिटी योजना निगरानी, पुलिसिंग और सहायता तंत्र को जोड़ती है. स्कूलों के लिए 2021 में सुरक्षा दिशानिर्देश भी जारी किए गए थे. पॉक्सो कानून में अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान है. लेकिन असली सवाल इन व्यवस्थाओं के अस्तित्व से आगे का है- क्या वे जरूरत के समय काम करती हैं?
कैमरा लगाना ही सुरक्षा नहीं
2020 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की दिल्ली पुलिस से संबंधित ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया था कि उस समय मौजूद केवल 55 से 68 प्रतिशत सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे थे और सिर्फ 22 से 48 प्रतिशत कैमरों की निगरानी कमांड सेंटर से हो पा रही थी. ऑडिट ने यह भी पाया था कि अपराध रोकने में कैमरों की प्रभावशीलता का आकलन नहीं किया गया था. ये आंकड़े पुराने हैं और वर्तमान व्यवस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करते, लेकिन वे एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाते हैं- क्या सुरक्षा ढांचा वास्तव में काम कर रहा है?
सुरक्षा ऑडिट का मतलब केवल कैमरे और लाइट गिनना नहीं होना चाहिए. यह भी देखना जरूरी है कि रोशनी काम कर रही है या नहीं, अंधे क्षेत्र कहां हैं, मदद मांगने का रास्ता स्पष्ट है या नहीं और सहायता कितनी जल्दी पहुंच सकती है.
सुरक्षा एक बार की स्थापना नहीं है. कैमरे खराब हो सकते हैं, लाइटें बंद हो सकती हैं, कर्मचारी बदल सकते हैं और नई संरचनाएं नए अंधे क्षेत्र बना सकती हैं. इसलिए सुरक्षा व्यवस्था में नियमित निगरानी, रखरखाव और जवाबदेही जरूरी है.
एक किशोरी को कोचिंग जाने, पार्क में जाने, स्कूल से लौटने या किसी दोस्त से मिलने से पहले हर जगह के खतरे का आकलन नहीं करना चाहिए. समाधान यह नहीं हो सकता कि महिलाओं और लड़कियों को उन जगहों से बचने की सलाह दी जाए जहां खतरा हो सकता है. लक्ष्य यह होना चाहिए कि उन जगहों को ही सुरक्षित बनाया जाए.
सच्ची सुरक्षा तब नहीं होगी जब लड़कियां खतरों से बचना सीख जाएंगी, बल्कि तब होगी जब सार्वजनिक स्थानों और संस्थानों की व्यवस्था से उन खतरों को व्यवस्थित रूप से कम किया जाएगा.

