श्रवण गर्ग | अब सड़कों से ‘घर वापसी’ हुकूमत की होनी है, जनता की नहीं!

नागरिकों के मन में एक जिज्ञासा है! तीन दिन से राहुल गांधी राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं. सारे विपक्षी सांसद पुलिसिया प्रतिरोध का सामना कर रहे हैं. मंगलवार के दिन गिरफ़्तारी के पहले राहुल, प्रियंका और अन्य लोग आठ घंटे तक संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी परिसर में धरना देते रहे. उन्हें और अन्य सैकड़ों सांसदों को नज़दीक ही स्थित ‘निर्वाचन आयोग’ की इमारत तक नहीं पहुँचने दिया गया. बुधवार को उन्हें ‘जनपथ’ से ‘जंतर मंतर’ तक बसों के द्वारा भी नहीं जाने दिया गया. उनकी बसों को जनपथ और अशोका रोड के चौराहे पर सुरक्षा बलों के पाँच हज़ार जवानों ने रोक दिया. तीन घंटे तक रोके रखा गया.

विपक्षी सांसद गुरुवार को राजघाट ज़रूर पहुँचे और बापू को श्रद्धांजलि भी अर्पित की. सांसदों की भारी भीड़ के साथ राजघाट तक पहुँचने के पहले समाधि के आसपास के इलाक़े को पुलिस द्वारा घेर लिया गया था.

नागरिक जानना चाहते हैं कि राहुल और विपक्षी सांसदों के आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, ज्ञानेश कुमार और इन तीनों अति महत्वपूर्ण विभूतियों से जुड़े हज़ारों अधिकारी-कर्मचारी तीन दिन तक क्या करते रहे होंगे? क्या ये सभी अपने-अपने कामों में लगे रहे होंगे या उनकी नज़रें टीवी के पर्दों पर ही टिकी रही होंगी, यह जानने के लिए कि अब सरकार का क्या होने वाला है?

ज्ञानेश कुमार, जो अब इतिहास में अमर हो चुके हैं, अपने दोनों विद्रोही सहयोगियों (संधू और जोशी) के साथ बैठकें करते रहे होंगे या फिर अपने और परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित होते रहे होंगे? नागरिकों की एक बड़ी चिंता यह भी है कि अब जितने भी दिन, सप्ताह या महीनों तक यह आंदोलन चलेगा, क्या इन सभी महानुभावों की दिनचर्या यही रहने वाली है? ज्ञानेश कुमार के पूर्व-निर्धारित यात्रा कार्यक्रम तो रद्द हो ही रहे हैं. क्या पीएम भी अब अपनी प्रिय विदेश यात्राओं पर नहीं निकल पाएँगे?

कल्पना करना चाहिए कि दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल अपनी सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे इतने बड़े आंदोलन और उसके कारण मचे कोलाहल के बीच भी प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन को समर्पित पच्चीस सालों का जश्न मनाने का साहस जुटा पा रहा है!

क्या थोड़ी जिज्ञासा इस रहस्य को जानने की भी नहीं होनी चाहिए कि मोदीजी ने जब बुधवार को नई दिल्ली के सरोजिनी नगर स्थित श्री विनायक मंदिर में पूजा-अर्चना की होगी, तब उनके मन में शांति रही होगी या कोई उथल-पुथल मची हुई होगी? सार्वजनिक जानकारी में मोदीजी शायद पहली बार ही इस मंदिर में गए होंगे. हो सकता है किसी विश्वसनीय व्यक्ति ने इस मंदिर की मान्यता के बारे में उन्हें बताया हो. दिल्ली में अपने आवास के दौरान मंदिर के घर के नज़दीक होने के कारण मैं कई बार वहाँ जा चुका हूँ.

प्रधानमंत्री के मंदिर दर्शन के बाद जानकारी यह प्रकट हुई कि मोदीजी ने भगवान गणेश से देशवासियों के लिए उत्तम स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि और कल्याण की कामना की. क्या मोदीजी ने अपने लिए कुछ भी नहीं माँगा होगा? गणेश जी तो विघ्नहर्ता के रूप में पूजे जाते हैं. मोदीजी की सरकार इस समय चारों तरफ़ से ‘विघ्नों’ का सामना कर रही है! हज़ारों-लाखों की संख्या में जेन-जी और अल्फ़ा-जी अपना प्रिय फ़ास्ट फ़ूड और फ़ास्ट म्यूज़िक छोड़कर ‘एक कचोरी, दो समोसा-मोदीजी पर नहीं भरोसा’ के नारे लगा रहे हैं.

दो अक्टूबर ‘गांधी जयंती’ के दिन जब मोदीजी बापू की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे होंगे अथवा ‘तीस जनवरी मार्ग’ स्थित ‘गांधी स्मृति’ स्थल पर पंद्रहवीं शताब्दी के महान गुजराती संत नरसिंह मेहता द्वारा रचित बापू का अत्यंत प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ परायी जाणे रे’ कभी सुन रहे होंगे, तो उन्हें अंदर से कैसा महसूस हो रहा होगा? क्या ‘जंतर मंतर’ पर मासूम बच्चों के कोमल शरीरों पर पुलिस द्वारा पहुँचाई जा रही पीड़ा की कराहें उन तक पहुँच पा रही होंगी?

सरकार और चुनाव आयोग कहीं ऐसा मानकर तो नहीं चल रहे हैं कि राहुल गांधी की अगुवाई वाला विपक्ष और हज़ारों-लाखों निर्दलीय बच्चे, जो इस समय सड़कों पर हैं, अभूतपूर्व संख्या में तैनात सुरक्षाकर्मियों और दक्षिणपंथी अराजकतावादियों के ख़ौफ़ से वापस घरों को लौट जाएँगे? वे अब लौटने वाले नहीं हैं. उन्हें पता है कि लौटने के बाद क्या हो सकता है और नहीं लौटने पर क्या हासिल करने का हौसला कमाया जा सकता है!

बीस जुलाई से आठ अक्टूबर के बीच जो खरोंचें और घाव प्रदर्शनकारियों के शरीरों पर सत्ता की हिंसा ने पैदा किए हैं, वे अब किसी को भी ख़ाली हाथ वापस घर नहीं लौटने देंगे! ‘घर वापसी’ की तैयारी तो उस हुकूमत को करना पड़ेगी, जो देश की जनता को आने वाले पचास सालों तक सत्ता पर क़ाबिज़ रहने की धमकियाँ दे रही है!

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