भारत की पहली बुलेट ट्रेन का ‘सपना’ देरी और बढ़ती लागत से क्यों जूझ रहा है, जापान के साथ मतभेदों के कारण लड़खड़ाया
भारत की पहली बुलेट ट्रेन को देश की महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक माना गया था—मुंबई और अहमदाबाद को जोड़ने वाला 508 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड कॉरिडोर, जिसे जापानी तकनीक और वित्तपोषण से बनाया जा रहा था. लेकिन एक दशक के बाद भी, यह ट्रेन अपने पहले यात्री को ले जाने से काफी दूर है. ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के मुताबिक, भारत की पहली बुलेट ट्रेन साझेदार जापान के साथ मतभेदों के कारण लड़खड़ा गई है.
मुंबई-अहमदाबाद परियोजना को 2015 में अनुमानित ₹980 अरब की लागत से स्वीकृति दी गई थी, जिसे बाद में संशोधित करके लगभग ₹1.87 ट्रिलियन (1.87 लाख करोड़) कर दिया गया. हालांकि, यह परियोजना भूमि अधिग्रहण में देरी, बढ़ती लागत और खरीद (प्रोक्योरमेंट) से जुड़े मतभेदों से घिरी रही है.
‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना को लेकर भारत और जापान के बीच मतभेद सामने आए हैं. इनमें सिग्नलिंग सिस्टम भी शामिल है, जिसे जापान की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी जर्मन औद्योगिक समूह सीमेंस को सौंप दिया गया है, साथ ही यह सवाल भी है कि भारत को किस हद तक इस तकनीक का स्वदेशीकरण करना चाहिए.
जापान केवल 0.1 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ऋण के माध्यम से परियोजना लागत का 81 प्रतिशत तक वित्तपोषित करने पर सहमत हुआ था, जिसे 15 साल की छूट (मोरेटोरियम) के साथ 50 वर्षों में चुकाया जाना है. लेकिन 2023 में सेवाएं शुरू करने का मूल लक्ष्य टल गया है. भारत अब 2027 में मार्ग के एक हिस्से पर सीमित परिचालन की उम्मीद कर रहा है—शुरुआत में 100 किलोमीटर के हिस्से पर, और वह भी धीमी, भारत में बनी ट्रेनों के साथ.
इन मतभेदों के केंद्र में यह सवाल है कि भारत को जापानी मॉडल को कितना अपनाना चाहिए और उसे घरेलू स्तर पर कितनी तकनीक विकसित करनी चाहिए.
‘फाइनेंशियल टाइम्स ’ ने जापान में परियोजना से जुड़े एक प्रतिभागी के हवाले से कहा, "यह बहुत बड़ी उलझन बन गया है." जापानी पक्ष का तर्क रहा है कि बुलेट-ट्रेन प्रणाली एक एकीकृत पैकेज के रूप में काम करती है, जिसमें ट्रैक, सिग्नलिंग और रोलिंग स्टॉक को सुरक्षा, विश्वसनीयता और समयबद्धता के लिए एक साथ संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
दूसरी ओर, भारतीय अधिकारियों ने अधिक घरेलू भागीदारी और लचीलेपन पर जोर दिया है, जिसमें स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेनों का विकास भी शामिल है. रिपोर्ट में एक वरिष्ठ जापानी राजनयिक के हवाले से कहा गया, "जापानी लक्ष्य यथार्थवादी स्तर पर तय करते हैं, और हम उन्हें बहुत अच्छी तरह से लागू करते हैं. वहीं भारतीय लक्ष्य ऊंचे तय करते हैं और उन्हें पूरी तरह से लागू तो नहीं कर पाते, लेकिन काफी हद तक ठीक कर लेते हैं."
‘द इंडिपेंडेंट’ में मरूशा मुज़फ्फर ने इस सवाल का विश्लेषण किया है कि क्या भारत की पहली बुलेट ट्रेन में हो रही देरी उसके जापान के साथ संबंधों में तनाव पैदा कर रही है? वह लिखती हैं कि ट्रेन परियोजना भूमि अधिग्रहण में देरी, महामारी और बढ़ती लागत (₹1.08 ट्रिलियन से बढ़कर ₹1.98 ट्रिलियन) के कारण अपने मूल लक्ष्य 2022 से पिछड़ गई है. अब 2027 तक इसके आंशिक संचालन की उम्मीद है.
इस देरी ने भारत और जापान के बीच तकनीकी और रणनीतिक मतभेदों को उजागर किया है. जापान पूरी तरह से अपनी एकीकृत शिंकानसेन प्रणाली लागू करना चाहता है, जबकि भारत 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत स्वदेशी ट्रेनों और यूरोपीय सिग्नलिंग सिस्टम को अपना रहा है.

