'हमारी नदी, हमारे पहाड़': राजस्थान में खनन परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदाय की लड़ाई
राजस्थान के सीकर जिले के दीपावास गांव में रहने वाले 40 वर्षीय ममराज मीणा की जिंदगी दिसंबर 2024 में बदल गई, जब उनके गांव में पहली बार एक जेसीबी मशीन पहुंची. उसी दिन उन्हें पता चला कि जिस जमीन पर उनका परिवार तीन पीढ़ियों से खेती करता आ रहा है, उसे राज्य सरकार ने एक खनन कंपनी को लीज पर दे दिया है.
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, ममराज का परिवार गेहूं, बाजरा, सरसों और चना जैसी फसलें उगाकर जीवनयापन करता है. लेकिन प्रस्तावित परियोजना से गांव के 35 आदिवासी परिवारों के सामने अपनी जमीन, घर और आजीविका खोने का खतरा पैदा हो गया. उनका कहना है कि उन्हें नौकरी या मुआवजा नहीं, बल्कि अपनी जमीन, जंगल और नदी चाहिए.
उदयपुर में पंजीकृत ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड दीपावास और आसपास लगभग 180 हेक्टेयर क्षेत्र में स्टील प्लांट स्थापित करना चाहती है. इनमें करीब 150 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है. ग्रामीणों का आरोप है कि इस क्षेत्र में उनकी निजी और परंपरागत उपयोग वाली जमीन भी शामिल है. उनका कहना है कि कंपनी ने इलाके की घेराबंदी कर दी, बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ काट दिए और खेती व पशु चराई पर रोक लगा दी.
परियोजना गिरजन नदी के किनारे प्रस्तावित है. कंपनी ने पर्यावरणीय दस्तावेजों में इसे मौसमी नाला बताया है, लेकिन स्थानीय लोग इसे ऐसी नदी मानते हैं, जिस पर कम से कम 17 गांव और पांच पंचायतों के करीब 60 हजार लोग निर्भर हैं. ग्रामीण बताते हैं कि वर्षों पहले उन्होंने चेक डैम बनाकर इस नदी को सालभर बहने लायक बनाया था. उनका डर है कि खनन शुरू होने पर प्रदूषण और खदानों का मलबा नदी और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाएगा.
दीपावास के आसपास का इलाका अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है, जो पहले भी अवैध और अनियंत्रित खनन का दंश झेल चुका है. वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में अरावली की 31 पहाड़ियों के गायब होने पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को अवैध खनन रोकने के निर्देश दिए थे.
परियोजना की जानकारी मिलने के बाद ग्रामीणों ने वरिष्ठ आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश मीणा से संपर्क किया. उन्होंने समुदाय से कहा कि लड़ाई अदालत में भी लड़ी जाएगी और जमीन पर भी. इसके बाद ग्रामीणों ने महीनों तक सरकारी विभागों से परियोजना से जुड़े दस्तावेज जुटाए.
जुलाई 2025 में तीन गांवों के लगभग 500 लोगों ने 'गिरजन नदी बचाओ आंदोलन' शुरू किया. ग्रामीणों ने पहाड़ी पर धरना दिया, आसपास के गांवों में जनसभाएं कीं, प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात की और पर्यावरण कानूनों की जानकारी जुटाई. बाद में वे 700 किलोमीटर लंबी 'अरावली संरक्षण यात्रा' में भी शामिल हुए, जिसका उद्देश्य अरावली क्षेत्र में बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों के प्रभाव को उजागर करना था.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने परियोजना के दस्तावेजों की जांच के बाद दावा किया कि यह क्षेत्र एक संरक्षित इलाके से पांच किलोमीटर के भीतर है. ऐसे मामलों में पर्यावरणीय मंजूरी उच्च स्तर पर मिलनी चाहिए थी, लेकिन मंजूरी राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण से दे दी गई.
अक्टूबर 2025 में ग्रामीणों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने कंपनी की घेराबंदी हटाने, खेती और चराई के अधिकार बहाल करने तथा पेड़ों की कटाई और संभावित जल प्रदूषण का मुद्दा उठाया. अधिकरण ने पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में कमियां तो मानीं, लेकिन तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर दी. ग्रामीणों का कहना था कि उन्हें समय रहते परियोजना की जानकारी ही नहीं मिली थी.
जनवरी 2026 में कंपनी ने खनन शुरू किया तो ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. उनका तर्क था कि परियोजना अरावली क्षेत्र में आती है और यहां खनन शुरू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक है. राजस्थान के खनन विभाग ने भी क्षेत्र को अरावली का हिस्सा मानते हुए कंपनी को काम रोकने का निर्देश दिया. राज्य पर्यावरण प्राधिकरण ने भी सुप्रीम कोर्ट की अनुमति लेने को कहा. इसके बावजूद ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने अपनी मशीनें और घेराबंदी अब तक नहीं हटाई है.
अब पूरे मामले की नजर सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस सुनवाई पर है, जिसमें अरावली की नई परिभाषा तय की जानी है. पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि अरावली का दायरा सीमित कर दिया गया तो संरक्षण वाले बड़े इलाके खनन के लिए खुल सकते हैं और दीपावास जैसे गांवों का संघर्ष फिर मुश्किल में पड़ सकता है.
ममराज मीणा कहते हैं कि इस लड़ाई ने उन्हें कानून, पर्यावरण और अपने अधिकारों के बारे में बहुत कुछ सिखाया है. उनका कहना है कि अब यह संघर्ष केवल उनकी जमीन का नहीं, बल्कि अरावली, जंगलों और नदियों को बचाने का आंदोलन बन चुका है. इसी विश्वास के साथ गांव के लोग आज भी पहाड़ी पर बैठकर एक ही नारा लगाते हैं.
"अरावली बचाओ, जीवन बचाओ."

