कक्षा 8 की एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका और भ्रष्टाचार पर लिखे एक हिस्से को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुओ मोटू कार्रवाई ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी की, सरकार ने तुरंत कैबिनेट बैठक की और प्रधानमंत्री ने भी हस्तक्षेप किया. सवाल यह है कि एक स्कूली पाठ पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों?
हरकारा डीप डाइव में प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ इस पूरे विवाद को व्यापक संदर्भ में समझने की कोशिश की गई. क्या समस्या सिर्फ एक वाक्य की है या पाठ्यपुस्तक निर्माण की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं? किताब कैसे लिखी गई, किन विशेषज्ञों को शामिल किया गया, और क्या इसका उद्देश्य छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना था या किसी राजनीतिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना?
चर्चा में यह भी उठा कि क्या न्यायपालिका पर बात करते समय सिर्फ भ्रष्टाचार का जिक्र काफी है, या कानून, पुलिस, कार्यपालिका और न्याय प्रणाली की पूरी जटिल प्रक्रिया को समझाना जरूरी है. क्या छात्रों को उनके सामाजिक यथार्थ से काटकर पढ़ाया जा रहा है? इतिहास, विज्ञान, गणित और भूगोल में हो रहे बदलावों को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आईं.
यह बहस सिर्फ न्यायपालिका की छवि की नहीं, बल्कि शिक्षा, पारदर्शिता और लोकतंत्र के भविष्य की है. आठवीं के बच्चों को हम क्या पढ़ा रहे हैं और किस तरह का नागरिक बनाना चाहते हैं – यही इस चर्चा का मूल प्रश्न है.
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