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जाति पर संघ की नई लाइन: बदलाव की शुरुआत या पुरानी सोच का नया चेहरा? भंवर मेघवंशी #harkara

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हरकारा डीप डाइव के इस विशेष एपिसोड में निधिश त्यागी के साथ लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जाति पर चल रही बहस को गहराई से समझाया. हाल ही में मोहन भागवत ने कहा कि कोई भी हिंदू सरसंघचालक बन सकता है और जाति अप्रासंगिक है. लेकिन क्या यह केवल बयान है या वास्तव में बदलाव की शुरुआत?

भंवर मेघवंशी ने बताया कि अब तक संघ के शीर्ष पदों पर कौन रहे हैं, संगठन की संरचना कैसी है और क्या वंचित वर्ग या महिलाएं कभी वास्तविक नेतृत्व तक पहुंच सकती हैं. उन्होंने मनुस्मृति, गोलवलकर, सावरकर और संघ की वैचारिक परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि जाति पर दोहरा रवैया अपनाया जाता है. सार्वजनिक मंच पर एक बात, लेकिन संगठनात्मक ढांचे में दूसरी तस्वीर दिखाई देती है.

चर्चा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर और मोहन भागवत के जाति संबंधी विचारों की तुलना भी की गई. अंबेडकर ने धर्मशास्त्रों को चुनौती देकर जाति उन्मूलन की बात की थी, जबकि संघ धर्मशास्त्रों को स्वीकार करते हुए जाति समाप्ति की बात करता है. क्या यह संभव है?

महिलाओं की भूमिका, जनसंख्या पर दिए गए बयान, जाति जनगणना, यूजीसी नियमों पर विवाद, ब्राह्मण वर्चस्व, दलित-बहुजन नेतृत्व का संकट और अंबेडकर की छवि के एप्रोप्रियेशन जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई.

यह बातचीत केवल एक बयान की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह समझने की कोशिश है कि जाति, धर्म और राजनीति के बीच असल समीकरण क्या है.

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