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अनुत्तरित लोग: भारत के आदिवासी कवि, मिटती भाषाएँ और हमारा समाज | कानजी पटेल #harkara

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क्या हम सचमुच भारत को जानते हैं, अगर हम उसके आदिवासी कवियों को नहीं जानते?
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी बात कर रहे हैं कवि, अनुवादक और संपादक कानजी पटेल से, उनकी महत्वपूर्ण किताब “अनुत्तरित लोग” पर, जो भारत भर के आदिवासी कवियों की लगभग 360 कविताओं का संग्रह है.
कांजी पटेल वर्षों से आदिवासी क्षेत्रों, आदिवासी अकादमी तेजगढ़ और डॉ. गणेश देवि के साथ काम करते रहे हैं. इस बातचीत में वे बताते हैं कि कैसे:
भारत में आदिवासी समुदायों की लगभग 600 भाषाएँ हैं और वे तेज़ी से विलुप्त हो रही हैं.
स्कूल और राज्य की भाषा-नीति आदिवासी बच्चों को शुरुआत से ही “हीन” महसूस कराती है.
औपनिवेशिक “क्रिमिनल ट्राइब्स” की छाप आज भी घुमंतु और डीनोटिफाइड समुदायों पर लगी हुई है.
PVTG, टी-ट्राइब, चाय बागान मज़दूर. वागरी, नट, खासी, नागा, गोंड, कोरकू जैसे समुदाय कविता में अपनी भूख, श्रम, वर्ग-संघर्ष और अपमान की कहानी कह रहे हैं.
विकास, सड़क, खदान, फैक्ट्री और चाय के कप में घुला हमारा आराम – आदिवासियों के जंगल, भाषा और इतिहास पर किस तरह चुपचाप चढ़ जाता है
एपिसोड में हम कुछ सशक्त कविताओं के अंश पर भी रुकते हैं:
वागरी समाज की स्त्री-पुरुष मेहनतकश ज़िंदगी में छुपा वर्ग-संघर्ष
नागालैंड की कवियों की आवाज़, जो कहती हैं – हमारे देवता, युद्ध, पहाड़ और मिथक तुमसे अलग हैं.
टी-ट्राइब की कवयित्री, जो कहती है – चाय का रंग लाल है, जैसे हमारे खून का
यह बातचीत सिर्फ साहित्य पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर भी है कि
अगर आदिवासी भाषाएँ और कविताएँ मिटती गईं, तो भारत का लोकतंत्र और हमारी अपनी इंसानियत किस रूप में बचेगी?

पढ़िए — कानजी पटेल की पुस्तक “अनुत्तरित लोग”:
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