पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक के अंश सामने आने के बाद संसद में जो हंगामा हुआ, उसने राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कारवां मैगजीन में प्रकाशित अंशों के आधार पर राहुल गांधी लोकसभा में चर्चा करना चाहते थे, लेकिन उन्हें बोलने से रोका गया. सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि पुस्तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसे उद्धृत नहीं किया जा सकता. लेकिन तथ्य यह है कि पुस्तक मुद्रित हो चुकी है और उसके अंश पहले भी मीडिया में सामने आ चुके हैं.
पुस्तक में चीन सीमा पर तनाव, आदेशों की प्रतीक्षा, और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका से जुड़े संवेदनशील विवरण बताए गए हैं. नरवणे ने लिखा कि चीनी टैंक करीब 500 मीटर तक आ गए थे, उन्होंने निर्देश मांगे, लेकिन स्पष्ट आदेश मिलने में देरी हुई. गलवान झड़प में सैनिकों के साथ हुई बर्बरता का भी उल्लेख है. अग्निवीर योजना पर भी उनके सुझाव और सरकार के निर्णय में अंतर की बात सामने आई है.
इस चर्चा में यह भी सवाल उठता है कि अगर संसद में बहस की अनुमति दी जाती, तो क्या सरकार अपना पक्ष रखकर मामला स्पष्ट कर सकती थी। चर्चा रोकने से क्या संदेह और बढ़ा? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर संसद में संवाद लोकतंत्र की मजबूती है या जोखिम? क्या छवि प्रबंधन और वास्तविक नीति के बीच कोई दूरी है?
यह वीडियो केवल एक किताब या एक बयान का मामला नहीं है. यह सवाल है जवाबदेही का, पारदर्शिता का, और उस विश्वास का जो सेना, संसद और नागरिकों के बीच होना चाहिए. पूरी बातचीत देखें और स्वयं तय करें कि इस पूरे घटनाक्रम में असली प्रश्न क्या है.
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