“कड़वी कॉफी” के हालिया एपिसोड में वैश्विक राजनीति के सबसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे, ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले पर प्रो. अपूर्वानंद ने कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण साहनी और पंकज कुमार से चर्चा की.
बातचीत की शुरुआत ही एक बुनियादी सवाल से हुई कि क्या इसे युद्ध कहा जाए या एकतरफा हमला? इस पर प्रवीण साहनी ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि “अग्रेशन (आक्रामकता) और टेररिज्म (आतंकवाद)” का मिश्रण है. उनके अनुसार, अमेरिका की भूमिका एक आक्रामक शक्ति की है, जबकि इजराइल की रणनीति टारगेटेड किलिंग (लक्षित हत्याएं) और खुफिया ऑपरेशंस (गुप्त अभियान) के जरिए आतंकवादी शैली की प्रतीत होती है. उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि पश्चिमी मीडिया ने इस हमले को बहुत सहजता से स्वीकार कर लिया.
चर्चा में बदलते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन पर बात करते हुए साहनी ने कहा कि यह संघर्ष केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस विश्व व्यवस्था के अंत का संकेत है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व में बनी थी. उनका दावा था कि अगर इस संघर्ष में अमेरिका कमजोर पड़ता है, तो एक नया “मल्टीपोलर वर्ल्ड (बहुध्रुवीय विश्व)” तेजी से उभरेगा, जिसमें चीन और रूस जैसी शक्तियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी.
ईरान की रणनीति को समझाते हुए साहनी ने “असिमेट्रिकल वॉरफेयर (असममित युद्ध)” की अवधारणा पर विस्तार से बात की. उनके अनुसार, ईरान ने पारंपरिक सैन्य ताकत के बजाय सस्ते और प्रभावी हथियारों जैसे ड्रोन (मानवरहित विमान), मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) और साइबर तकनीक (साइबर प्रौद्योगिकी) का इस्तेमाल कर एक ऐसी युद्ध प्रणाली विकसित की है, जो बड़ी सैन्य शक्तियों को भी चुनौती दे सकती है.
उन्होंने कहा कि ईरान इस संघर्ष को धार्मिक युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता की लड़ाई के रूप में देख रहा है. वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और इजराइल के कुछ बयान इसे धार्मिक रंग देते नजर आते हैं, जो इस पूरे संघर्ष को और जटिल बना देता है.
भारत की भूमिका पर उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति अब संतुलित नहीं दिखती और वह अमेरिका के करीब झुकी हुई नजर आती है. उनके अनुसार, यदि कोई देश मध्यस्थता करना चाहता है, तो उसे पूरी तरह तटस्थ होना चाहिए, जो इस समय भारत के मामले में स्पष्ट नहीं है.
पंकज कुमार के सवाल कि “क्या दुनिया इस समय नेतृत्व के संकट से गुजर रही है?” पर साहनी ने कहा कि पारंपरिक पश्चिमी नेतृत्व कमजोर जरूर हुआ है, यह समस्या सिर्फ पश्चिमी दुनिया में है, लेकिन ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण), जिसमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका शामिल हैं, में नई ताकतें उभर रही हैं, जो भविष्य की दिशा तय कर सकती हैं.
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