अराजकता, दमन और बढ़ता जनाक्रोश | श्रवण गर्ग #harkara
खाँसी का अलग इलाज, ज़ुकाम का अलग — पर पूरे शरीर का टेस्ट किसी ने नहीं कराया. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस बातचीत में वही करते हैं जो हमारा रोज़ का न्यूज़ साइकिल नहीं करता — पिछले डेढ़ महीने की अलग-अलग दिखती घटनाओं को एक साथ रखकर देखते हैं. 20 जुलाई के जंतर-मंतर से लेकर 4 सितंबर तक की घटनाएँ जब एग्रीगेट होती हैं, तो जो तस्वीर उभरती है वह बेचैन करने वाली है. बातचीत में: • स्वतंत्र भारद्वाज का मामला और यह सवाल कि ऐसा शख़्स वीआईपी दायरों तक कैसे पहुँचता रहा • इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट जिसके मुताबिक़ जंतर-मंतर एफ़आईआर में नामज़द 2,873 लोगों में गंभीर अपराधों के आरोपी हैं और कम से कम 25 वे हैं जो जेल में सज़ा काट रहे थे — तो फिर फ़ेशियल रिकग्निशन सिस्टम क्या पहचान रहा है? • 4 पीएम की दो महिला पत्रकारों का साकेत थाने वाला आरोप, और आशीष जोशी की हिरासत • एसआईआर पर एसवाई क़ुरैशी का आकलन — तीन चरणों में 13 करोड़ नाम, यानी दो राज्यों की आबादी के बराबर • जीडीपी पर 7.8 बनाम 2.6 का विवाद • हल्द्वानी, खरगे साहब और 25 दिन बाद भी एफ़आईआर नहीं • और सबसे ज़रूरी हिस्सा — बंगाल और तमिलनाडु का सबक़: ममता और स्टालिन ने भी यही रास्ता चुना था, नतीजा सामने है श्रवण गर्ग का निष्कर्ष सीधा है — इनकंपीटेंस और अहंकार एक साथ नहीं चल सकते. और अगर आप नहीं बदलेंगे, तो लोग रिजीम बदल देंगे. चेतावनी: इस बातचीत की कुछ बातें आपको विचलित कर सकती हैं. मेज़बान: निधीश त्यागी मेहमान: श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार हरकारा — शोर कम, रोशनी ज़्यादा. हमारा काम पसंद आए तो चैनल सब्सक्राइब करें, वीडियो शेयर करें और हरकारा को सहयोग दें: harkaraonline.com #हरकारा #श्रवणगर्ग #निधीशत्यागी

