आरएसएस, पाकिस्तान और नई विदेश नीति: क्या बदल रही है संघ की सोच? श्रवण गर्ग #harkara
हरकारा डीप डाइव के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के हालिया बयान, भारत-पाकिस्तान संबंधों, संघ की राजनीति, विदेश नीति और भारतीय मुसलमानों की स्थिति पर गंभीर चर्चा की. बातचीत की शुरुआत होसबोले के उस बयान से होती है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने, सांस्कृतिक रिश्ते मजबूत करने और “पीपल टू पीपल कॉन्टैक्ट” बढ़ाने की बात कही. इस बयान को लेकर दोनों पत्रकारों ने सवाल उठाया कि क्या यह संघ की सोच में बदलाव का संकेत है या बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच एक रणनीतिक मजबूरी. श्रवण गर्ग ने कहा कि दत्तात्रेय होसबोले केवल आरएसएस के सामान्य पदाधिकारी नहीं बल्कि संगठन के दूसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाते हैं और भविष्य में मोहन भागवत के उत्तराधिकारी भी हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे में पाकिस्तान पर दिया गया उनका बयान केवल “निजी राय” नहीं माना जा सकता. गर्ग ने इस बात पर जोर दिया कि जिस संगठन ने दशकों तक पाकिस्तान, मुसलमानों और विभाजन की राजनीति को अपने विस्तार का आधार बनाया, उसी संगठन के शीर्ष नेता का अब पाकिस्तान से संवाद और सांस्कृतिक संबंधों की बात करना एक बड़ी राजनीतिक घटना है. बातचीत में यह सवाल भी उठा कि क्या आरएसएस अब पहली बार पाकिस्तान के अस्तित्व को वास्तविक रूप से स्वीकार कर रहा है. श्रवण गर्ग ने कहा कि संघ लंबे समय तक “अखंड भारत” और विभाजन को अस्वीकार करने की राजनीति करता रहा है. इसलिए पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य बनाने की बात अपने आप में एक वैचारिक बदलाव जैसी लगती है. उन्होंने इसकी तुलना उन देशों से की जो लंबे समय तक इजराइल को मान्यता नहीं देते थे और बाद में कूटनीतिक यथार्थ के कारण संबंध स्थापित करने पड़े. इंटरव्यू में भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास और “अमन की आशा” जैसे पुराने प्रयासों का भी जिक्र हुआ. श्रवण गर्ग ने बताया कि 2010 में टाइम्स ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के जंग ग्रुप के बीच शुरू हुए इस मीडिया और सांस्कृतिक संवाद कार्यक्रम में दोनों देशों के पत्रकार, बुद्धिजीवी और कलाकार शामिल हुए थे. उन्होंने कहा कि होसबोले आज जिन बातों की वकालत कर रहे हैं, जैसे लिबरल वीजा नीति, सांस्कृतिक संवाद और नागरिक स्तर पर संपर्क, वही बातें उस समय भी उठाई गई थीं. लेकिन बाद में इन्हें राजनीतिक स्तर पर आगे नहीं बढ़ाया गया.

