जंतर-मंतर के बाद क्या बचा? आंदोलन, उम्मीदें और अनुत्तरित सवाल | श्रवण गर्ग #harkara

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी ने 6 जून को जंतर-मंतर पर हुए चर्चित प्रदर्शन और उसके राजनीतिक निहितार्थों पर चर्चा की. बातचीत का केंद्र भीड़ का आकार नहीं, बल्कि इस पूरे घटनाक्रम का अर्थ और उसका असर था. श्रवण गर्ग ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल छात्र और अभिभावक वास्तविक पीड़ा और उम्मीद के साथ दिल्ली पहुंचे थे. लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई ठोस परिणाम निकला. उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था और नीट जैसे मुद्दों पर छात्रों की चिंता आज भी बरकरार है. चर्चा में “कॉकरोच जनता पार्टी” को एक राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ डिजिटल युग के एक प्रयोग के रूप में भी देखा गया. श्रवण गर्ग का तर्क था कि सोशल मीडिया और एआई के दौर में यह समझना जरूरी है कि जनभावनाओं को किस तरह संगठित और प्रभावित किया जा सकता है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह वास्तव में जन आंदोलन था या एक ऐसा प्रयोग जिसने लोगों की उम्मीदों का इस्तेमाल किया. बातचीत के दौरान विपक्ष, नागरिक समाज और कई चर्चित चेहरों की भूमिका पर भी चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने कहा कि कई लोग इस अभियान के समर्थन में दिखाई दिए, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उससे दूरी बनाते भी नजर आए. इससे आंदोलन की विश्वसनीयता और उद्देश्य को लेकर नए सवाल पैदा हुए. अभिजीत दीपके के बदलते बयानों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन की ताकत उसके स्पष्ट लक्ष्य और निरंतरता में होती है. यदि संदेश लगातार बदलते रहें तो लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है. चर्चा का निष्कर्ष यह रहा कि 6 जून का प्रदर्शन केवल एक दिन की घटना नहीं था. उसने डिजिटल राजनीति, जन आंदोलनों, विपक्ष की रणनीति और युवाओं की उम्मीदों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. सबसे बड़ा प्रश्न अब भी वही है कि जिन छात्रों और परिवारों के नाम पर यह पूरा अभियान खड़ा हुआ, उनकी समस्याओं का समाधान आखिर कैसे होगा.

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