हसदेव से निकोबार तक, पर्यावरण बनाम विकास की नई जंग #harkara
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने पर्यावरण कार्यकर्ता और लेखक सत्यम श्रीवास्तव के साथ भारत में पर्यावरण संरक्षण, जंगलों की कटाई, आदिवासी अधिकारों और न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर चर्चा की. बातचीत की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से हुई जिसमें पूछा गया कि ऐसी कौन-सी विकास परियोजना है जिसका पर्यावरणवादियों ने विरोध नहीं किया हो. यह सवाल सिर्फ अदालत की एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस सोच का संकेत माना जा रहा है जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं को विकास की राह में बाधा के रूप में देखा जाने लगा है. भारत इस समय रिकॉर्ड गर्मी और जलवायु संकट का सामना कर रहा है. देश के कई हिस्सों में तापमान लगातार बढ़ रहा है. दूसरी ओर खनन, सड़क, बांध और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है. ऐसे समय में पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय समुदाय अक्सर अदालतों की ओर देखते हैं. लेकिन हाल के कुछ फैसलों और टिप्पणियों ने यह चिंता पैदा कर दी है कि क्या न्यायपालिका का झुकाव भी अब पर्यावरण संरक्षण से अधिक निवेश और विकास परियोजनाओं की ओर हो रहा है. सत्यम श्रीवास्तव का कहना है कि पर्यावरणविदों को विकास विरोधी बताना कोई नई बात नहीं है. पहले सामाजिक आंदोलनों, इतिहासकारों और अन्य विशेषज्ञों को निशाना बनाया गया, अब पर्यावरण कार्यकर्ता भी उसी श्रेणी में खड़े किए जा रहे हैं. जबकि पर्यावरण का सवाल किसी एक व्यक्ति या समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों का सवाल है. भारत में चिपको आंदोलन से लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन तक पर्यावरणीय संघर्षों ने हमेशा सार्वजनिक हित की बात की है. चर्चा में वनाधिकार कानून 2006 का विशेष उल्लेख हुआ. यह कानून आदिवासी और जंगलों पर निर्भर समुदायों के ऐतिहासिक अधिकारों को मान्यता देने के लिए बनाया गया था. लेकिन हाल के कुछ फैसलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब समुदायों के अधिकार और बड़े निवेश आमने-सामने आते हैं तो प्राथमिकता किसे मिलती है. छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य का उदाहरण इसी संदर्भ में सामने आया, जहां खनन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटने की तैयारी की जा रही है. हसदेव सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र है. पर्यावरणविदों का कहना है कि सरकार के अपने वैज्ञानिक संस्थानों ने भी चेतावनी दी है कि यहां खनन से जल स्रोतों, वन्यजीवों और स्थानीय पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है. इसके बावजूद परियोजनाओं को मंजूरी मिल रही है. यही कारण है कि पर्यावरण कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि यदि विशेषज्ञों की चेतावनियों को भी नजरअंदाज किया जाएगा तो पर्यावरणीय निर्णयों की विश्वसनीयता कैसे बनी रहेगी. बातचीत में ग्रेटर निकोबार, सिंगरौली, पन्ना टाइगर रिजर्व और अरावली जैसे उदाहरण भी सामने आए. इन मामलों में एक समान चिंता दिखाई देती है कि विकास परियोजनाओं के लिए उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया जा रहा है जिन्हें पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है. सवाल यह है कि यदि संरक्षित वन और टाइगर रिजर्व भी सुरक्षित नहीं हैं तो संरक्षण की अवधारणा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है. सत्यम श्रीवास्तव ने यह भी तर्क दिया कि भारत की वन व्यवस्था आज भी काफी हद तक औपनिवेशिक सोच से प्रभावित है. अंग्रेजों के समय जंगलों को संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि संसाधनों के दोहन के लिए आरक्षित किया गया था. उनके अनुसार आज भी कई नीतियां जंगलों को जीवित पारिस्थितिकी तंत्र की बजाय आर्थिक संसाधन के रूप में देखती हैं. इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि पर्यावरण का सवाल केवल पेड़ों या वन्यजीवों तक सीमित नहीं है. यह पानी, हवा, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है. एक पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होता, बल्कि जीवन की पूरी श्रृंखला का हिस्सा होता है. यदि विकास की कीमत जंगलों, नदियों और पर्यावरण के विनाश के रूप में चुकाई जाएगी, तो उसका असर आने वाले दशकों तक दिखाई देगा. इसलिए पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की बहस केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न बन चुकी है.

