भारत के आर्थिक संकट, मोदी सरकार की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर बड़ा सवाल | श्रवण गर्ग #harkara

हरकारा डीप डाइव के इस इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील, देश की आर्थिक स्थिति, सोने के आयात, तेल संकट, विदेशी मुद्रा भंडार, शेयर बाजार और राजनीतिक विश्वसनीयता पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नागरिकों से “सोना कम खरीदने”, “पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने”, “वर्क फ्रॉम होम अपनाने” और “खर्च कम करने” की अपील से होती है. इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं के बड़े काफिलों, रोड शो और सरकारी खर्चों का जिक्र करते हुए इस विरोधाभास पर सवाल उठाया गया कि जनता से त्याग मांगने वाली सत्ता खुद उसी सादगी का पालन करती दिखाई क्यों नहीं देती. श्रवण गर्ग ने कहा कि सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक नहीं बल्कि “विश्वास का संकट” है. उनके अनुसार जनता प्रधानमंत्री की अपील को उसी तरह स्वीकार नहीं कर रही जैसी कोविड काल में करती थी. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर संकट इतना बड़ा है तो सरकार खुद उसे खुलकर स्वीकार क्यों नहीं कर रही, और अगर संकट नहीं है तो फिर जनता से त्याग की अपील क्यों की जा रही है. बातचीत में यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री के बयान के तुरंत बाद सरकार के मंत्री और प्रवक्ता सफाई देने लगते हैं कि “कोई कमी नहीं है”, जिससे संदेश खुद कमजोर पड़ जाता है. चर्चा में सोने के आयात, डॉलर पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति पर विस्तार से बात हुई. श्रवण गर्ग ने 1990-91 के आर्थिक संकट, चंद्रशेखर सरकार द्वारा सोना गिरवी रखने और बाद में पी. वी. नरसिंह राव तथा मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्तमान संकट केवल वैश्विक कारणों से नहीं बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं और राजनीतिक खर्चों से भी जुड़ा हुआ है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी राजनीति, प्रचार और छवि निर्माण पर भारी खर्च कर रही है जबकि आम नागरिकों से बचत और बलिदान की अपेक्षा की जा रही है. इंटरव्यू में शेयर बाजार की गिरावट, रुपये की कमजोरी, गोल्ड इंपोर्ट, तेल की बढ़ती कीमतों और संभावित कठोर सरकारी कदमों पर भी चर्चा हुई. बातचीत में आशंका जताई गई कि आने वाले समय में सरकार सोने के आयात पर पाबंदियां, इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी, तेल खपत पर नियंत्रण और वर्क फ्रॉम होम जैसे कदमों की तरफ बढ़ सकती है. साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि क्या सरकार जनता को पूरी सच्चाई बता रही है या केवल “नियंत्रित संदेश” के जरिए हालात संभालने की कोशिश हो रही है. बातचीत में मानसून, खेती, उर्वरक संकट और श्रीलंका के आर्थिक संकट का भी उल्लेख हुआ. श्रवण गर्ग ने चेतावनी दी कि अगर आर्थिक और कृषि नीतियों में गंभीर तैयारी नहीं हुई तो आने वाले महीनों में स्थिति और कठिन हो सकती है. उन्होंने कहा कि नागरिक संकट में सरकार के साथ खड़े होने को तैयार होते हैं, लेकिन उसके लिए नेतृत्व में विश्वसनीयता और पारदर्शिता जरूरी होती है.

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