राहुल गांधी के सामने बढ़ती चुनौतियां, लोकतंत्र पर गहराता संकट | श्रवण गर्ग #harkara
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधिश त्यागी ने राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन के बहाने भारतीय राजनीति, विपक्ष की चुनौतियों, नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्थिति और भारत के लोकतांत्रिक भविष्य पर विस्तार से चर्चा की. श्रवण गर्ग ने कहा कि राहुल गांधी के जन्मदिन पर इस बार जो भीड़ और उत्साह दिखाई दिया, वह केवल एक राजनीतिक नेता के प्रति समर्थन नहीं है. उनके अनुसार यह देश के भीतर बढ़ती बेचैनी और बदलाव की इच्छा का संकेत है. खासकर युवाओं के बीच यह भावना मजबूत हुई है कि अब सत्ता से सवाल पूछे जाने चाहिए और किसी वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश जरूरी है. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबला भर नहीं है. असली चुनौती विपक्ष के भीतर बढ़ती टूट-फूट, दल-बदल और राजनीतिक दबावों की है. राज्यसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश और झारखंड की घटनाएं बताती हैं कि विपक्षी एकता को कमजोर करने की कोशिशें लगातार जारी हैं. उनके अनुसार यह केवल चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक संतुलन की लड़ाई भी है. श्रवण गर्ग ने यह भी कहा कि सत्ता के भीतर शक्ति संरचना बदलती दिखाई दे रही है. उनके अनुसार 2014 के शुरुआती वर्षों की तुलना में अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति में भी फैसले लगातार होते रहते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि निर्णय लेने वाली एक अलग व्यवस्था सक्रिय है. जी-7 सम्मेलन और डोनाल्ड ट्रंप के साथ नरेंद्र मोदी की मुलाकात का जिक्र करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि इस बार प्रधानमंत्री की प्रस्तुति पहले जैसी आत्मविश्वासपूर्ण नहीं दिखी. उन्होंने ट्रंप के बयानों को भारत की राजनीति और विदेश नीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत माना. उनके अनुसार भारत पर अमेरिका का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है और यह स्थिति लोकतांत्रिक स्वायत्तता के लिए चिंता का विषय है. ईरान से जुड़े घटनाक्रम और भारतीय नाविकों की मौत का उल्लेख करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि भारत सरकार ने इस मुद्दे पर अपेक्षित दृढ़ता क्यों नहीं दिखाई. उनका कहना था कि यह केवल विदेश नीति नहीं बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न भी है. श्रवण गर्ग ने कहा कि भारत के सामने आज आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हैं. एक तरफ विपक्षी दलों को कमजोर करने की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ वैश्विक शक्ति संतुलन के दबाव हैं. ऐसे माहौल में राहुल गांधी के प्रति बढ़ता जनसमर्थन केवल लोकप्रियता का संकेत नहीं, बल्कि लोकतंत्र को लेकर जनता की बढ़ती चिंता और उम्मीदों की अभिव्यक्ति है. चर्चा के अंत में श्रवण गर्ग ने कहा कि राहुल गांधी का जन्मदिन इस बार एक राजनीतिक उत्सव से ज्यादा एक संदेश की तरह दिखाई देता है. लोगों की उम्मीदें उनके साथ जुड़ती जा रही हैं और यही उम्मीदें उनकी जिम्मेदारियों को भी बढ़ा रही हैं. उनके अनुसार आने वाले समय की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र और संस्थागत स्वतंत्रता को बचाए रखने की लड़ाई होगी.

